नशे के काले बाजार से जुड़े लोगों ने शिक्षा का हब होने के कारण देहरादून पर ज्यादा फोकस किया है। बाहरी राज्यों के छात्र-छात्राओं की अधिकता होने के कारण सौदागरों ने स्मैक, चरस और हेरोइन की खपत बढ़ाने में युवाओं को शिकार बनाया है। नेटवर्क से जुडे़ लोगों की संख्या सैकड़ों में नहीं बल्कि हजारों में है।
अधिकांश तो ऐसे हैं जो खुद ड्रग्स का सेवन करते-करते अब तस्कर बन चुके हैं। वर्ष 2019 के 11 माह में अकेले देहरादून में साढ़े पांच करोड़ के मादक पदार्थों की बरामदगी हुई। यह माल वह है जो पुलिस के हाथ लगा है।
कारोबार कितना होगा, इसका अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। नशे को लेकर हरिद्वार दूसरे नंबर पर है। वहां करीब दो करोड़ की स्मैक, चरस, अफीम आदि की बरामदगी हुई है। ऊधमसिंह नगर बरामदगी के मामले में प्रदेश में तीसरे नंबर पर है।
पड़ोसी राज्यों की पुलिस से समन्वय की कमी का तस्कर फायदा उठाते हैं। पुलिस इनकी गिरफ्तारी के बाद यह दावा करने से नहीं थकती कि स्मैक, अफीम, नशे की गोलियां और इंजेक्शन की खपत यूपी के बरेली, मुरादाबाद और सहारनपुर से आती है। गिरफ्तारी के बाद पुलिस अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती है। इस अवधि में मादक पदार्थों में करीब 1600 लोगों की गिरफ्तारी हुई है। लेकिन हैरत की बात यह है कि आरोपियों से संबंधित थाना पुलिस को रिपोर्ट भेजने की जरूरत महसूस नहीं की जाती। बरेली के फतेहगंज इलाके से नशा बाजार के बड़े मगरमच्छ पूरे नेटवर्क को संचालित कर रहे हैं। लेकिन किसी स्तर पर संयुक्त ऑपरेशन की पहल नहीं की गई।
बच्चाें और महिलाओं का बनाया हथियार
नशे की तस्करी में अब बच्चों और महिलाओं को भी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। शहर में ऐसे कई ठिकाने हैं, जहां बच्चों और महिलाओं की मदद से मादक पदार्थों की बिक्री की जाती है। वर्ष 2019 में एक दर्जन के करीब महिलाओं को पुलिस जेल भेजने में कामयाब रही। बच्चों की कई बार काउंसिलिंग कराने के बाद भी स्थिति में किसी तरह का सुधार नहीं आया है।
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की प्राथमिकता में शामिल होने के बावजूद वर्ष 2019 में एंटी ड्रग्स पॉलिसी नहीं बन पाई। यह हाल तब है जब स्पेशल टॉस्क फोर्स कई माह पहले कई राज्यों की पॉलिसी पर मंथन कर प्रस्ताव शासन को भेज चुकी है। उसमें पुलिस के अलावा स्वास्थ्य विभाग, समाज कल्याण और शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी तय की गई है। इसमें सरकारी नशा मुक्ति केंद्रों के अलावा स्कूल और कॉलेजों की भी जवाबदेही तय की गई है।
पंजाब के बाद नशे को लेकर उत्तराखंड सुर्खियों में है। प्रदेश की कमान संभालने के बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पंजाब की तरह प्रदेश में एंटी ड्रग्स पॉलिसी बनाने की बात कही थी। करीब दो साल पहले उन्होंने पंजाब में ड्रग्स के खिलाफ सामूहिक रणनीति बनाने को हुए मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन के बाद मुख्य सचिव को पॉलिसी तैयार करने को कहा था। इसी कड़ी में स्पेशल टास्क फोर्स की डीआईजी रिद्धिम अग्रवाल को एंटी ड्रग्स पॉलिसी का मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी थी।
एसटीएफ ने पंजाब और जम्मू-कश्मीर की एंटी ड्रग्स पॉलिसी का मंथन करने के बाद स्वास्थ्य विभाग, समाज कल्याण और शिक्षा विभाग के नोडल अधिकारियों से मंथन किया था। एसटीएफ ने कई माह पहले एंटी ड्रग्स पॉलिसी का मसौदा तैयार कर पूरा प्रस्ताव शासन को भेज दिया था। उम्मीद थी कि एंटी ड्रग्स पॉलिसी पर इस साल शासन की मोहर लग जाएगी। 2019 बीतने वाला है, लेकिन पॉलिसी पर कोई फैसला नहीं हो सका है।
ड्रग्स कारोबार रोकने के लिए मौजूदा व्यवस्थाओं को सुदृढ़ किया जा रहा है। उत्तर भारतीय राज्य आपस में मिलकर सूचनाएं आदान प्रदान कर रहे हैं। इसके लिए चंडीगढ़ में बने नोडल कार्यालय को प्रदेश से जोड़ा गया है। प्रदेश पुलिस को नशे के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के शासन स्तर से निर्देश जारी होते हैं, जिनकी समय समय पर समीक्षा भी होती है। ठोस नीति तैयार कर इस पर पूरी तरह से रोकथाम की जाएगी।
- नितेश झा, सचिव गृह
नए साल में नशा बाजार से जुड़े सौदागरों को टारगेट कर कार्रवाई की जाएगी। वर्ष 2019 में पुलिस की कार्ययोजना काफी हद तक कारगर रही है। इसका परिणाम रहा कि व्यापक स्तर पर मादक पदार्थों की बरामदगी हुई है। नशे के खिलाफ जागरूकता की मुहिम आगे भी जारी रहेगी।
-अशोक कुमार, पुलिस महानिदेशक, कानून व्यवस्था, उत्तराखंड