देहरादून की वर्षा माटा तकरीबन 17 साल से रक्तदान कर रही हैं। अब तक 30 से अधिक बार वह खून दे चुकी हैं।
स्वैच्छिक रक्तदान
पहले पिता को किडनी की बीमारी के चलते वर्षा ने रक्तदान का यह क्रम शुरू किया था, जो आज स्वैच्छिक रक्तदान में बदल चुका है। +ए ब्लड ग्रुप धारी वर्षा माटा इस वक्त पटेलनगर में रह रही हैं।
उनके पिता रमेश चावला का 1997 में निधन हो गया था। उनकी घंटाघर पर खाने-पीने की दुकान थी। पिता की मौत के बाद से वह लगातार हर चौथे-पांचवे माह रक्तदान करती हैं। 70 के दशक में जन्मीं वर्षा के अनुसार उनकी दो बेटियां हैं।
इनमें से बड़ी 14 साल की है, लेकिन वह डिसेबल है। ऐसी स्थिति में किसी के लिए भी कुछ अच्छा कर सकने का भाव बेहद संतोष देता है। अहसास होता है कि यह खून किसी की जीवनरक्षा में काम आ सकता है। यह अहसास ही बहुत है।
जीवनदात्री ब्लड डोनेशन कैंप 8 को
अमर उजाला फाउंडेशन की तरफ से गठित जीवनदात्री क्लब का पहला ब्लड डोनेशन कैंप आने वाली आठ मार्च को गांधी रोड स्थित जैन धर्मशाला में लगाया जा रहा है।
महिला दिवस के उपलक्ष्य में लगाया जाने वाला यह कैंप सुबह साढ़े 10 बजे से शुरू होकर शाम चार बजे तक चलेगा। इसमें जीवनदात्री क्लब की सदस्यों के साथ ही रक्तदान करने की इच्छुक अन्य युवतियां, महिलाएं रक्तदान कर सकेंगी।
रक्तदान न करते तो मर गए होते...
यह मामला एक आईएस अफसर का है। ब्लड बैंकिंग अथॉरिटी के आग्रह पर हम उनका नाम-पता नहीं लिख रहे। इस अफसर ने स्वैच्छिक रक्तदान कैंप में ब्लड डोनेट किया था। जांच हुई तो पता चला कि वह हेपेटाइटिस-बी पॉजीटिव हैं।
ब्लड बैंक ने अफसर को जांच रिपोर्ट भेज दी। उनकी शादी होने वाली थी। रिपोर्ट मिलने के बाद शादी टाल दी गई। अफसर ने दिल्ली में इलाज कराया। बाद में रिपोर्ट निगेटिव आई तब शादी की।
कहते हैं कि अगर रक्तदान न करते तो वक्त से पता न चल पाता कि हेपेटाइटिस बी पॉजीटिव हैं। अक्सर रोगियों को बाद में पता चलता है, उस वक्त जान बचना मुश्किल होती है।