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अमर उजाला बेस संवाद: युवाओं ने रखे अपने विचार, कहा- सम्मान के साथ संवाद का बेहतर माध्यम है हिंदी

Mon, 24 Aug 2020 11:07 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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हिंदी हैं हम - फोटो : Amar Ujala
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हिंदी हम सबको जोड़ने वाली भाषा है। हमारी भावनाओं को एक-दूसरे तक पहुंचाने की जुबान है। इसमें जितनी संजीदगी है, उतना ही बेहतर संवाद का माध्यम है। फिर चाहे वह घर-परिवार, स्कूल-कॉलेज हो या प्रोफेशन की दुनिया। हर जगह हिंदी का झंडा बुलंद तो जरूर है लेकिन अभी इसे और ऊंचाईयों पर ले जाने की जरूरत है। सोमवार को अमर उजाला बेस संवाद वेबिनार में शामिल हुए अलग-अलग प्रोफेशन के युवाओं ने कुछ इसी अंदाज में हिंदी से अपना जुड़ाव बयां किया। 

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लाइब्रेरी के कोनों में है हिंदी की जगह
वेबिनार में यह बात भी प्रमुखता से सामने आई कि चूंकि उच्च शिक्षा या प्रोफेशनल कोर्स हिंदी में कम ही उपलब्ध होते हैं, इसलिए हिंदी किसी भी विवि की लाइब्रेरी के एक कोने में सिमटकर रह जाती है। हिंदी में कविताएं और साहित्य तो बहुत मिलेगा लेकिन अगर विशेषकर प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों के नजरिए से देखें तो किताबें बेहद कम मिलेंगी। हमारी उच्च शिक्षा काफी हद तक अंग्रेजी की पाठ्यसामग्री पर ही निर्भर है।

छात्रों को बताई जाए हिंदी की अहमियत
अमर उजाला बेस वेबिनार में शामिल हुए विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि आज हमें स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों तक हिंदी की अहमियत को समझाना होगा। अंग्रेजी का बहिष्कार न करें लेकिन अपनी मातृभाषा को लेकर भी उतनी ही गंभीरता से पेश आएं।
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रोजी-रोटी से जुड़ेगी तो आगे बढ़ेगी हिंदी
कोई भी भाषा अगर पेट से जुड़ जाए तो वह निश्चित तौर पर आगे बढ़ती है। अंग्रेजी के साथ काफी हद तक यह बात सही साबित हुई है लेकिन अगर हम हिंदी को भी रोजी-रोटी से जोड़ देंगे तो निश्चित तौर पर इसका संरक्षण होगा। वेबिनार में शामिल हुए लोगों का कहना था कि हमें कुछ भर्तियां ऐसी भी करनी चाहिए, जिनमें अंग्रेजी की बाध्यता न हो।

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इन्होंने रखे अपने विचार

हिंदी हमारी ताकत है। चाहे आप दुनिया में कहीं पर भी हों, हिंदी व अपनी संस्कृति के साथ जुड़े रहना आपके लिए आवश्यक होता है। अंग्रेजी महत्वपूर्ण जरूर है लेकिन हिंदी ज्यादा सुलभ रहती है। हम जितना अपनी मातृभाषा के साथ जुड़े रहेंगे, उतना ही प्रभावी लगेगा। जहां तक सम्मान की बात आती है, उसमें हम हर जगह जरूर बोलते हैं कि हिंदी हमारी भाषा है, हम इसे सम्मान देंगे। कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां कि हिंदी का प्रयोग और बढ़ाया जा सकता है। शोध और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हिंदी को देखें तो यह काम अभी मुश्किल है, क्योंकि हमने पुराने दिनों में अंग्रेजी पर ज्यादा जोर दिया है, इसके चलते हिंदी पिछड़ती चली गई।
- साहिब सबलोक, मार्केटिंग हेड, ग्राफिक एरा ग्रुप 

मैं मूलरूप से मराठी हूं लेकिन छह साल से उत्तराखंड में काम करने के बाद सही मायनों में हिंदी को लेकर मेरी गलतफहमी दूर हुई। यह ऐसी भाषा है जो हर किसी के बीच दिल से रिश्ता बना देती है। हमारे पास तमाम ऐसे भी होनहार बच्चे आते हैं जो कि हिंदी माध्यम के होते हैं। अंग्रेजी जानते हैं लेकिन हिंदी बोलने में ज्यादा सुलभ महसूस करते हैं। लिहाजा, हम ऐसे बच्चों से हिंदी में ही बात करते हैं। रही बात, हिंदी की तो इंजीनियरिंग कोर्स या शोध के नजरिये से देखने की तो इस दिशा में अभी बहुत काम करने की जरूरत है। 
- अक्षय घोड़पड़े, सीनियर मैनेजर, ब्रांडिंग एंड कम्युनिकेशंस, डीआईटी यूनिवर्सिटी 

हिंदी में एक अलग ही अपनापन होता है। वैसे तो तमाम कस्टमर ऐसे होते हैं जो कि फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं लेकिन वह ज्यादा समय तक नहीं बोलते। जब बात खरीदारी की आती है तो इसी अपनेपन की चाहत में वह हिंदी में बोलना शुरू कर देते हैं। यही हिंदी की ताकत और खास पहचान है। हमें प्रोफेशन में भी हिंदी को तवज्जो देनी चाहिए। जब तक बहुत जरूरी न हो, अंग्रेजी पर जोर न दें।
- रजत मोहन उपाध्याय, मैनेजर, टीवीएस मोटर्स, देहरादून

जब तक हमने उच्च शिक्षा ली तो अंग्रेजी में ही ज्यादा पढ़ाई हुई लेकिन स्टार्टअप शुरू करने के बाद हिंदी की सही मायनों में अहमियत पता चलनी शुरू हुई। आज हम अपने उत्पादों की मार्केटिंग में हिंदी को तवज्जो देते हैं। आज भी हिंदी आम भाषा है, अंग्रेजी आम पहुंच से दूर है। हमें हिंदी को बढ़ावा देना चाहिए। इस पर हम सबको नाज होना चाहिए। अमर उजाला के हिंदी हैं हम अभियान के बहाने में सबको यह कोशिश करनी चाहिए कि हिंदी को अपने जीवन की भाषा बनाएं।
- अर्पित जैन, सह संस्थापक, सनफॉक्स टेक्नोलॉजीज स्टार्टअप 

पूर्व के वर्षों में जिस तरह से अंग्रेजी को बढ़ावा दिया गया, उससे समाज में एक असमंजस पैदा हुआ है। वह इस बात का कि किस भाषा में बोलना ज्यादा प्रभावी होता है। हालांकि, अगर हम निचोड़ देखें तो नतीजे पर हिंदी ही सबसे ऊपर मिलेगी। किसी भी बातचीत का निष्कर्ष हिंदी में ही सबसे बेहतर निकलता है। हिंदी हमारी मातृभाषा ही नहीं बल्कि हमारी पहचान है। इस पहचान को बचाए रखने के लिए हम सबको प्रयास करने होंगे। समाज को जागृत करना होगा। खासतौर से उन लोगों को जो कि अंग्रेजी बोलने को ही कामयाबी का पैमाना मानते हैं।
- मानस उपाध्याय, संस्थापक, डी टाउन रोबोटिक्स स्टार्टअप 

हिंदी हमारी पहचान है। आज अमर उजाला ने जो शुरुआत की है, हम सबको उसमें पूरा सहयोग देना है। अपनी कंपनी या व्यक्तिगत तौर पर जब भी हिंदी हैं हम अभियान में जरूरत होगी, हम साथ खड़े हुए हैं। मूलरूप से उत्तराखंड जैसे हिंदी भाषी राज्य के होने के नाते हम सबकी जिम्मेदारी बनती है कि इस भाषा को संवर्धन और संरक्षण के लिए काम करें।
-  अविनाश चंद्रपाल, सह संस्थापक, डी टाउन रोबोटिक्स स्टार्टअप
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