कामकाज के साथ घर की जिम्मेदारी :आयुषी
मॉडल आयुषी यशवर्धन ने कहा कि हमारे समाज का ढांचा कुछ इस प्रकार का है कि महिला को कामकाजी होने के बाद भी कई प्रकार के संघर्ष से जूझना पड़ता है। उन्हें अपने कामकाज के साथ घर की जिम्मेदारी भी यथावत निभानी पड़ती है। कन्या गुरुकुल महाविद्यालय की शिक्षक डॉ. अर्चना डिमरी ने कहा कि पुरुष आज भी घर के कार्यों की जिम्मेदारी सिर्फ घर की महिला की ही मानते हैं, लेकिन शिक्षा के प्रचार व प्रसार से देश में शिक्षित महिलाओं की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही और पढ़ लिख कर नौकरियां करने लगी हैं। इससे जिस समाज में महिला की कमाई को अनुचित समझा जाता था, आज उसी समाज में महिला की कमाई से घर चलने लगे हैं। रस्मिता चट्टोपाध्याय और दीपांजलि चक्रवर्ती ने कहा कि व्यावसायिक भूमिका और परंपरागत भूमिकाओं को एक साथ निभाना एक महिला के लिए प्राकृतिक और कृत्रिम रूप से बहुत कठिन हो जाता है। आज भी परिवार में अनेक कार्य व भूमिकाएं हैं जिनके निर्वाह की पूरी जिम्मेदारी एक महिला की ही मानी जाती है। इस प्रकार एक कार्यरत महिला के लिए दोनों क्षेत्रों में समायोजन करना बड़ी समस्या उत्पन्न कर देता है।
‘पीरियड के पहले दिन मिले ऐच्छिक अवकाश’
महिलाओं को मासिक धर्म के पहले दिन मिले ऐच्छिक अवकाश कार्यक्रम में संजना भागवत ने कहा कि महिलाओं को मासिक धर्म या पीरियड के दौरान मानसिक और शारीरिक तौर पर अन्य दिनों की तुलना में अलग परेशानी झेलनी होती है। महिलाओं को पेट दर्द और कमजोरी होती है। कामकाजी महिलाओं को मासिक धर्म के पहले दिन ऐच्छिक अवकाश दिया जाए। कहा कि हमारे देश में कामकाजी महिलाओं के लिए मासिक धर्म या पीरियड्स के दौरान छुट्टी को लेकर कोई ठोस प्रावधान नहीं है। कहा कि महिलाओं को अपने वेतन के मामले में पुरुष कर्मचारी की तुलना में असमानता का सामना करना पड़ता है।
प्यारी पहाड़न के नाम के लिए झेलना पड़ा विरोध
कारगी चौक पर प्यारी पहाड़न नाम से रेस्टोरेंट चलाने वाली प्रीति मंदोलिया ने बताया कि महिला के सामने घर से बाहर निकलकर कुछ काम करने में बहुत चुनौतियां हैं। शुरू में उन्हें रेस्टोरेंट के नाम को लेकर खुद को संस्कृति के रख वाली करने वाले बताने वाले लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा, जबकि इस नाम से अपनी संस्कृति की पहचान का अहसास होता है। सवाल सोच और नजरिए का है। अब भी उन्हें और महिला कर्मियों को रेस्टोरेंट चलाने में पुरुष प्रधान समाज में दिक्कत झेलनी पड़ती है। प्रीति ने कहा कि वह पांच साल तक के बच्चों को निशुल्क भोजन कराती हैं। पहाड़ी संस्कृति व पहाड़ी खानपान को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने प्यारी पहाड़न रेस्टोरेंट की स्थापना की थी।
‘शहर में बनाए जाएं ब्रेस्ट फीडिंग सेंटर’
महिलाओं ने कहा कि इस समय शहर में किसी भी पार्क, चौराहे या अन्य किसी सार्वजनिक स्थान पर ब्रेस्ट फीडिंग सेंटर नहीं है। ऐसे में जो महिलाएं अपने नवजात बच्चों के साथ घर से बाहर निकलती हैं, उन्हें अपने बच्चों को दूध पिलाने में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई बार उचित जगह न मिलने पर तो कई बार एकांत न होने से ऐसा करना संभव नहीं होता। बहुत जरूरत होने पर कोई चारा न होने पर महिलाओं को सड़क किनारे कोई जगह तलाशनी पड़ती है। इस समस्या के समाधान के लिए शहर में कई जगह ब्रेस्ट फीडिंग सेंटर बनाए जाएं, जिससे महिलाओं को बड़ी राहत मिलेगी।