अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने सुमेरु पीठाधीश्वर जगद्गुरु नरेंद्रानंद सरस्वती को नोटिस देकर एक महीने के भीतर जवाब मांगा है। पीठाधीश्वर से पूछा गया है कि अखाड़ा परिषद के मना करने के बावजूद उन्होंने हरिद्वार जाकर स्वामी अच्युतानंद तीर्थ को शंकराचार्य पद पर आसीन कैसे कराया। उत्तर न मिलने पर जगद्गुरु का संत जगत से बहिष्कार किया जाएगा।
हाल ही में प्रयाग में हुई बैठक में उन्हें नोटिस देने का निर्णय लिया गया था। गौरतलब है कि महाशिवरात्रि के दिन हरिद्वार में शारदा पीठ पर आसीन हुए स्वामी अच्युतानंद तीर्थ के कार्यक्रम में अखाड़ों ने जाने से इनकार कर दिया था। जो संत गए भी उन्हें बहिष्कृत कर दिया गया। उसी दिन अच्युतानंद तीर्थ को भी संत जगत से बहिष्कृत कर दिया गया था।
दो संतों ने अखाड़ों से क्षमा याचना की तो उन्हें वापस भी ले लिया गया। जगद्गुरु नरेंद्रानंद सरस्वती ने अखाड़ा परिषद की आपत्ति पर कोई जवाब नहीं दिया था। इसे लेकर काशी में भी काफी मतभेद उभर आए थे। अखाड़ा परिषद ने उस विद्वत परिषद से भी सवाल जवाब किए हैं, जिसने अच्युतानंद तीर्थ को शंकराचार्य पद पर अभिषेक के बाद आसीन किया था।
विद्वत परिषद ने जगद्गुरु नरेंद्रानंद सरस्वती के आदेशानुसार हरिद्वार जाने की बात कही थी। याद रहे कि काशी में विद्वत परिषदें भी अनेक हैं और जो विद्वत परिषद आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य के पूर्व से स्थापित है, उसका कोई प्रतिनिधि अभिषेक करने हरिद्वार नहीं आया था। अब अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत नरेंद्र गिरी ने सुमेरु पीठाधीश्वर स्वामी नरेन्द्रानंद को नोटिस देकर एक महीने के भीतर जवाब मांगा है।
श्रीमहंत नरेंद्र गिरी ने बताया कि अखाड़े सर्वोच्च हैं और उनका विरोध करने वालों का दाना पानी संत जगत से बंद कर दिया जाता है। बहिष्कृत किए गए साधुओं को न तो कोई बुलाता है और न ही उनके आमंत्रण पर कोई संत उनके आयोजनों में जाता है।
उन्होंने बताया कि शंकराचार्यों की चार अधिकृत पीठों के अलावा शंकराचार्य अथवा जगद्गुरु नामधारी किसी संत को आने वाले प्रयाग अर्द्धकुंभ में भूमि आवंटन नहीं होने दिया जाएगा। साथ ही जो स्वयंभू शंकराचार्य बने बैठे हैं, वे तो प्रयाग में प्रवेश ही नहीं कर पाएंगे। उन्होंने बताया कि कुछ और संतों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।