यौन शोषण के गंभीर आरोप के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज एके गांगुली के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज न होने से कानून के जानकार भी हैरान हैं।
उनका कहना है कि विधि प्रशिक्षु की शिकायत के बावजूद प्रकरण में रिपोर्ट दर्ज न कर जजों की कमेटी बनाया जाना कानून का दुरुपयोग है। इस मामले में दोहरी नीति अपनाई गई है।
सीआरपीसी 154 ख यह कहती है कि यौन शोषण के मामले में मौखिक या तहरीर पर एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। महिला अधिकारी रिपोर्ट दर्ज करेगी, इसके बाद 24 घंटे के भीतर पीड़िता के 164 के बयान दर्ज होने चाहिए थे। एफआईआर में देरी से जांच प्रभावित हो सकती है।
-गुरमीत सिंह लक्की, वरिष्ठ अधिवक्ता
यौन शोषण के आरोप के बाद एके गांगुली को पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे देना चाहिए था। न तो उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई न ही उन्होंने अब तक इस्तीफा दिया।
-शिवचरण सिंह रावत, वरिष्ठ अधिवक्ता
मामला हाईप्रोफाइल है तो जांच कमेटी बना दी गई। तीन जजों की कमेटी बनाकर कानून का दुरुपयोग किया गया है। इस तरह की कमेटी की कोई व्यवस्था नहीं है। पहले रिपोर्ट दर्ज होती और तब जांच होती।
-नरेश मित्तल, वरिष्ठ अधिवक्ता
सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष हैं, ऐसे में सीधे उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं की जा सकती। पहले मामले की जांच होना सही है, कई बार आरोप बेबुनियाद हो सकते हैं।
-रजिया बेग, उत्तराखंड बार काउंसिल की पूर्व अध्यक्ष
इस तरह की व्यवस्था बना दी गई है कि कानून खास और आम के लिए अलग-अलग हो गया है, इस तरह की व्यवस्था ठीक नहीं है।
-सुयश कुकरेती, वरिष्ठ अधिवक्ता