मिशन पर गए लोग चीनी हिरासत में
इसी बीच मुख्यालय से उनके पास फोन आया। वरिष्ठ अधिकारी ने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने कुछ लोगों को सीमा पार भेजा था। डोभाल ने बताया कि उन्हें लगा था कि टीम लौट रही होगी, क्योंकि उसे पांच-छह दिन में वापस आ जाना चाहिए था। लेकिन तब तक करीब 10-11 दिन बीत चुके थे।
इसके बाद उन्हें पता चला कि मिशन पर गए लोग चीनी हिरासत में हैं। बताया कि चीनी सैनिकों ने उन्हें पकड़कर पूछताछ की थी। बाद में बातचीत के बाद उन्हें लौटा दिया गया। जब टीम वापस आई तो उसकी हालत बेहद खराब थी।
कठिन दौर में किसी घटना को अंतिम पड़ाव मान लेना जरूरी नहीं
इस पूरे घटनाक्रम के बाद मामले की जांच शुरू हुई। डोभाल ने छात्रों को बताया कि उस समय उन्हें लगा था कि उनका करियर खत्म हो गया। वह अभी 20 की उम्र में ही थे और उन्हें लगा कि अब उन्हें अपने लिए कोई दूसरा करियर तलाशना पड़ेगा।
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हालांकि जांच पूरी होने के बाद उन्हें इस मामले में दोषी नहीं पाया गया। डोभाल ने बताया कि बाद में सामने आया कि मुख्यालय से उपलब्ध कराए गए स्केच और नक्शों में कुछ खामियां और गलतियां थीं। इसी वजह से मिशन में यह स्थिति पैदा हुई।
अपने इस अनुभव के जरिए डोभाल ने छात्रों को यह भी बताया कि करियर के कठिन दौर में किसी घटना को अंतिम पड़ाव मान लेना जरूरी नहीं है। उनका खुद का अनुभव बताता है कि जिस घटना को उन्होंने कभी अपने करियर का अंत समझ लिया था, वह उनके जीवन की आगे की यात्रा को रोक नहीं सकी।