कहते हैं कि शांतिकाल में तो कोई भी धैर्य दिखा सकता है, लेकिन संकट के समय ही धैर्य और सिद्धांतों की असली परीक्षा होती है। उत्तराखंड राज्य के इतिहास की सबसे बड़ी आपदा थी केदारनाथ त्रासदी। और वही समय था जब एक नवोदित राज्य के साथ-साथ अखबारों के न्यूज रूम की परीक्षा हो रही थी। मैं बड़े गौरव भाव से बताना चाहूंगा कि तब न्यूज रूम के धैर्य और सिद्धांतों की परीक्षा में अमर उजाला अव्वल रहा।
हमने आपदा से जुड़ी हर एक खबर को पुष्टि के साथ छापने के साथ ही पूरी तस्वीर अपने पाठकों के सामने रखी। आज जबकि अमर उजाला का देहरादून संस्करण रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर रहा है, तब अपने इस गौरवमयी अनुभवों को यहां साझा करना चाहूंगा।
पत्रकारिता के मानदंडों का पालन करते हुए अपना दायित्व निभाया
एक जून 2013 को देहरादून आफिस में ज्वाइनिंग देने के साथ ही तत्कालीन संपादक द्वारा मुझे गढ़वाल की जिम्मेदारी दे दी गई। गढ़वाल को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि 15 दिन बाद ही यानी 16-17 जून को केदारनाथ में आपदा आ गई। जल प्रलय ने पूरे देश को झकझोर दिया। केदारनाथ यात्रा के अंतिम पड़ाव रामबाड़ा का नामोनिशान मिट गया।
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पूरा क्षेत्र मलबे में समा गया। यहां तक कि केदारनाथ मंदिर की पहचान भी मुश्किल हो गई। इन विकट हालात में आपदा की सही तस्वीर जनता के सामने रखना बड़ी चुनौती थी, लेकिन अमर उजाला ने इस घड़ी में भी पत्रकारिता के मानदंडों का पालन करते हुए अपना दायित्व निभाया।
तब रुद्रप्रयाग में हमारे साथी पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए थे। 16 जून को आपदा की जानकारी नहीं हो पाई, लेकिन इतनी खबर थी कि केदारनाथ क्षेत्र में पानी बढ़ रहा है। अगले दिन 17 जून को खबर आ गई कि केदारनाथ यात्रा का अंतिम पड़ाव रामबाड़ा जल प्रलय में समा गया है और यात्रा के दौरान दिन रात चहकने वाला गौरीकुंड कस्बा भी आधा साफ हो गया है।
बगैर पुष्टि के नहीं छापी गई खबर
देर रात आई इतनी बड़ी खबर पर एकाएक विश्वास नहीं हुआ। अमर उजाला के मानदंडों के अनुसार इतनी बड़ी घटना को बगैर पुष्टि के नहीं छापा जा सकता था। वरिष्ठों की पूरी टीम अपने-अपने स्रोतों से वस्तुस्थिति का पता लगाने में जुट गई। देर रात किसी सूत्र से रामबाड़ा पड़ाव के मलबे में समाने की पुष्टि होने पर ही इस घटना को प्रकाशित किया गया, लेकिन इसे सनसनी के तौर पर पेश नहीं किया गया।
जल प्रलय का यह तांडव 16 जून की दोपहर से लेकर 17 जून तक चला।अगले दिन भी जल प्रलय की खबरों को सनसनी नहीं बनाया गया। दूसरे दिन भी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो रही थी। खबर तो देनी थी, लिहाजा न्यूज रूप में पूर्ण विचार मंथन के बाद ही आपदा से जुड़ी खबरें आगे बढ़ाई गई।
खबर ही नहीं, तस्वीरें भी पूरी जांच परख और पुष्टि के बाद की गई प्रकाशित
तीसरे दिन तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कैबिनेट मंत्री डा. हरक सिंह रावत ने आपदा प्रभावित केदारनाथ क्षेत्र का हवाई सर्वेक्षण कर आपदा के मंजर की तस्वीरें मीडिया को जारी कीं। इन तस्वीरों में पूरा मंदिर क्षेत्र मलबे से पटा था। केदारनाथ मंदिर भी पहचान में नहीं आ रहा था।
यह तस्वीरें हालांकि सरकार ने जारी की थी, लेकिन आपदा का मंजर भयानक दिखने से संपादक जी ने इन सभी तस्वीरों की भी पुष्टि कराई। यही नहीं न्यूज रूम में भी उन्होंने वरिष्ठ साथियों को बुलाकर यह तस्वीरें दिखाई। उनका कहना था कि जो भी साथी केदारनाथ धाम गए हैं, वे तस्वीरों को देखें। कहने का अर्थ है कि खबर ही नहीं, तस्वीरें भी पूरी जांच परख और पुष्टि के बाद प्रकाशित की गई।