मेहताब आलम
हरिद्वार।
ईद के त्यौहार से पहले ईदी की रस्म भाई-बहन के रिश्ते में प्यार की मिठास घोल रही है। इन दिनों भाई अपनी बहनों के लिए तोहफे के तौर पर कपड़े, खाने पीने और जरूरत का सामान लेकर उनकी ससुराल पहुंच रहे हैं। मुस्लिमों में ईद उल फितर को सबसे बड़े त्यौहार के तौर पर मनाया जाता है। रमजान के पूरे महीने रोजे रखने और कुरआन की तिलावत जैसी तमाम इबादतें पूरी करने वाले मोमिनों के लिए हदीस में ईद को अल्लाह का तोहफा बताया गया है। इस त्यौहार पर गरीब परिवारों में भी नए कपड़े बनाए जाते हैं। इन दिनों बाजारों में खरीदारी का दौर पूरे शबाब पर है। ईद से पहले बहनों के लिए ईदी की रस्म कई मायनों में खास है। भाई खासतौर पर अपनी विवाहित बहनों के घर ईदी की रस्म निभाने जाते हैं। ईदी में बहन और उसके परिवार के कपड़े जूते से लेकर शीर जैसे पकवान बनाने का सामान रहता है। बहनों और उनके बच्चों के लिए नगद ईदी भी रहती है। भाई बहन के खूबसूरत रिश्ते में ईदी की खास बात यह है कि हर भाई अपनी हैसियत के मुताबिक बहनों के घर ईदी के तौर पर कुछ न कुछ जरूर पहुंचाता है। बहनों को भी भाई के घर से ईदी आने का शिद्दत से इंतजार रहता है।
ईद उल फितर में अब गिनती के तीन दिन बचे हैं। हफ्ते भर से ईदी पहुंचाने का दौर चल रहा है। दूर दूर से भाई अपनी बहनों करे घर ईदी लेकर पहुंच रहे हैं। इससे दोनों तरफ खुशी और उल्लास का माहौल है। बहनों को अपने भाई के घर आने की खुशी ऐसे रहती है कि मानो ईद से पहले ही ईद हो गई। वहीं भाई भी अपनी बहन को उसका हक देकर ऐसा महसूस करते हैं जैसे रमजान की सारी इबादतें कुबूल हो गई।
बदलते जमाने में बढ़ गया ईदी का चलन
बदलते जमाने में जब महंगाई रोजमर्रा की जरूरतों पर असर डाल रही है, ऐसे वक्त में भी ईदी का चलन घटने के बजाय और बढ़ गया है। भाइयों का मानना है कि बहनों के खुश होने पर उनकी किस्मत से और तरक्की मिलेगी। ईदी में पारंपरिक तौर पर कपड़े और शीर का सामान जैसे चावल, चीनी, सूखे मेवे रहते हैं। बदलते दौर में ईदी का दायरा बढ़ा है। अब भाइयों की तरफ से बहनों के मन पसंद उपहार भी दिए जाने लगे हैं।
ताकी सब मना सकें ईद की खुशियां
इस्लाम में कलमा, नमाज, रोजा, हज और जकात पांच अहम अरकान हैं। इनमें जकात के तौर पर हर संपन्न मुस्लिम को अपनी सालाना आमदनी का ढाई फीसदी हिस्सा जरूरतमंदों को दान करने का हुक्म दिया गया है। कुरआन में आता है कि अपनी जकात ईमानदारी से अदा किया करो, ऐसा न करने वाले का माल आखिरत में उसके लिए मुसीबत का सबब होगा। चूंकि बरकतों के महीने रमजान में नेकी का सवाब 70 गुना बढ़ा दिया जाता है। ऐसे में जकात भी अमूमन इसी महीने में अदा की जाती है, जिससे जरूरतमंदों की जरूरतें पूरी हो सकें और सभी ईद की खुशियां मना सकें।