संदीप थपलियाल
श्रीनगर। हिमालय में ब्लैक कार्बन का अब सटीक डाटा मिल जाएगा। भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) और एचएनबी केंद्रीय गढ़वाल विवि श्रीनगर संयुक्त रुप से हिमालयी क्षेत्र और ग्लेशियरों में इसका जमीनी अध्ययन करेंगे। इसके लिए विभिन्न स्थानों में ब्लैक कार्बन एरोसोल मीजरमेंट स्टेशन स्थापित किए जाएंगे। प्रथम चरण में माणा (बदरीनाथ) के समीप स्टेशन स्थापित किया जा रहा है, जो कार्बनेसियस एरोसोल (सूक्ष्म कण, जो आंख से नहीं दिखाई देते हैं), ग्लेशियर और वातावरण का भौतिक व रसायनिक विश्लेषण कर रिपोर्ट तैयार करेगा। यह रिपोर्ट भारत सरकार को दी जाएगी, ताकि उसकी मात्रा कम करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जा सकेंगे।
आईआईटीएम के दिल्ली यूनिट के ऑफिस इंचार्ज (उप निदेशक) डा. सुरेश तिवारी ने बताया कि कार्बनेसियस एरोसोल मुख्यत: दो अवयवों आर्गेनिक कार्बन और ब्लैक कार्बन से मिलकर बनता है। ब्लैक कार्बन काफी खतरनाक है। यह एक हफ्ते तक वातावरण में उड़ता रहता है। यह मैदानी क्षेत्रों से उड़कर हिमालय में जमा हो जाता है। जब यह ग्लेशियर में जमा होता है, तो सूर्य की किरणों को बहुत तेजी से अवशोषित करता है, जिससे ग्लेशियर की ऊपरी परत गरम हो जाती है और ग्लेशियर पिघलने लगते हैं।
उन्होंने बताया कि अभी तक स्थानीय स्तर पर यह स्टडी नहीं हुई है कि कितना ब्लैक कार्बन स्थानीय है और कितना हवा के साथ उड़कर अन्य स्थानों से पहुंचा है। ब्लैक कार्बन कितनी सोलर एनर्जी सोख रहे हैं। ग्लेशियर किस रफ्तार से गल रहे हैं? इसके लिए हिमालयी क्षेत्र में प्रत्येक 50-60 किलोमीटर के दायरे में ब्लैक कार्बन एरोसोल मीजरमेंट स्टेशन स्थापित करने की योजना बनाई गई है। अभी मात्र 4-5 जगह पर स्टेशन हैं, जिसमें उत्तराखंड का रानीचौरी भी शामिल है। जल्द ही बदरीनाथ से आगे माणा के समीप भी स्टेशन स्थापित कर दिया जाएगा। इसकी मॉनीटरिंग का जिम्मा गढ़वाल विवि के भौतिकी विभाग को दिया गया है। अगले माह तक माणा के आगे भी स्टेशन स्थापित कर दिया जाएगा। डा. तिवारी ने बताया कि स्टेशन स्थापित होने से हिमालय में ब्लैक कार्बन का सटीक डाटा मिल जाएगा। जब हमारे पास यह डाटा होंगे, तब हम सरकार को कम करने की योजना बनाकर देंगे।