ब्यूरो/अमर उजाला,ऋषिकेश।
राज्य सरकार द्वारा घोषित संस्कृतनगरी ऋषिकेश में द्वितीय राजभाषा संस्कृत का अस्तित्व संकट में है। तीर्थनगरी में संचालित 12 संस्कृत विद्यालयों व महाविद्यालयों में सृजित 52 शिक्षकों के सृजत पदों में से 22 पद पदों पर शिक्षक कार्यरत हैं। लिहाजा संस्कृत नगरी में देववाणी का दारोमदार प्रबंधकीय व्यवस्था पर तैनात मामूली मानदेय पाने वाले शिक्षकों पर है। संस्कृत को राज्य की द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने वाली सरकार यहां राजभाषा के अस्तित्व बचाने को लेकर कतई गंभीर नहीं है।
भाजपा की पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में उत्तराखंड में न सिर्फ संस्कृत को राज्य की द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया गया था, बल्कि धर्मनगरी हरिद्वार व तीर्थनगरी ऋषिकेश को बाकायदा संस्कृत नगरी भी घोषित किया गया था। मगर संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने में जल्दबाजी दिखाने वाली सरकार ने न तो संस्कृत की दुर्दशा की ओर गौर किया और न ही वर्तमान सरकार इस तरफ गंभीर है।
संस्कृत नगरी में संचालित संस्कृत प्रणाली के विद्यालयों व महाविद्यालयों की स्थिति यह है कि यहां सृजित अधिकांश प्राचार्यों, प्रधानाचार्यों व सहायक आचार्यों के पद पूर्ववर्ती शिक्षकों के सेवानिवृत्त होने के बाद भरे ही नहीं गए। रिक्त पदों पर प्रबंधकीय शिक्षकों के समायोजन का मामला भी कई वर्षों से शासन स्तर पर लंबित है। जिस पर पात्रता के बावजूद सरकार व संस्कृत निदेशालय निर्णय नहीं ले सका है।
क्या है विद्यालयों में शिक्षकों की तैनाती की स्थिति
विद्यालय का नाम कुल सृजित पद कार्यरत शिक्षक प्रबंधकीय शिक्षक
बाबा कालीकमली संस्कृत महाविद्यालय- 05 01 03
अखंड वेदांत संस्कृत विद्यालय 03 00 00
जयराम संस्कृत महाविद्यालय 03 00 04
पंजाब सिंध क्षेत्र साधु महाविद्यालय 05 02 05
मुनीश्वर वेदांग संस्कृत महाविद्यालय 07 01 03
श्री भरत मंदिर संस्कृत विद्यालय 06 03 01
श्री वेद विद्यालय 03 02 02
नेपाली संस्कृत विद्यालय 06 04 04
श्री दर्शन संस्कृत महाविद्यालय 03 00 07
स्वर्गाश्रम ट्रस्ट संस्कृत महाविद्यालय 03 00 03
दैवी संपद अध्यात्मक संस्कृत महाविद्यालय 05 05 06
ब्रह्मचर्य संस्कृत विद्यालय लक्ष्मणझूला 03 03 00 विद्यालय बंद
प्राचार्य,प्रधानाचार्यों के पद भी रिक्त
संस्कृत नगरी के दर्जन भर विद्यालयों में एक को छोड़ दें तो 11 विद्यालयों में प्रधानाचार्य, प्राचार्य के पद भी कई समय से रिक्त चल रहे हैं। नेपाली संस्कृत विद्यालय को छोड़कर अन्य सभा में आचार्यों को कार्यवाहक प्रधानाचार्य का दायित्व सौंपा गया है।
इसकी सुनिए
माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पदों पर अन्य व्यवस्थाएं की गई हैं। पीटीए, शिक्षा बंधु, शिक्षा मित्र, शिक्षा आचार्य, अतिथि शिक्षक आदि के तौर पर पदों को भरा गया है, मगर रिक्त पदों के चलते संस्कृत शिक्षा को आगे बढ़ाने वाले प्रबंधकीय शिक्षकों के बारे में आज तक सरकार चुप्पी साधे हुए है। उसे इन शिक्षकों को संस्कृत विद्यालयों में रिक्त पदों पर समायोजित करना चाहिए।
- जनार्दन कैरवान, प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखंड संस्कृत विद्यालय प्रबंधकीय शिक्षक संघ।