श्रीनगर। एचएनबी गढ़वाल विवि में चल रहे बाल उलार नाट्य समारोह में मंचित ‘फितरती चोर’ नाटक ने मनोरंजन के साथ ही गंभीर संदेश दिया। नाटक के माध्यम से दिखाया गया कि एक चोर को सच बोलने पर किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। यहां तक कि वह गुरु को दिए हुए वचन को निभाने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर देता है।
शनिवार शाम को लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केंद्र में विजयदान देथा की कहानी पर आधारित नाटक ‘फितरती चोर’ का मंचन हुआ। इसका नाट्य रूपांतरण केंद्र के चतुर्थ सेमेस्टर के छात्र ईश्वर शून्य ने किया। दिलीप गुप्ता के निर्देशन में स्कूली बच्चों ने बेहतर अभिनय से दर्शकों को बांधे रखा।
कथानक के अनुसार फितरती चोर अपने गुरु को मजाक में वचन देता है, कि मैं सोने की थाली में खाना नहीं खाऊंगा, मैं कभी हाथी की सवारी नहीं करूंगा, मैं किसी रानी से विवाह नहीं करूंगा, मैं किसी देश का राजा नहीं बनूंगा और मैं कभी झूठ नहीं बोलूंगा। चोर को स्वयं को चोर बोलने से हास्यापद स्थिति उत्पन्न होती है। पुलिस से लेकर जनता सोचती है कि यह पागल है। इसी का फायदा उठाकर वह चोरी करता है। एक बार वह राजमहल में चोरी करते हुए पकड़ा जाता है। उसे रानी के सामने पेश किया जाता है। वह चोर के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखती है, लेकिन वह मना कर देता है। वह गुरु को दिए वचन को निभाने के लिए अपनी जान देने से भी पीछे नहीं हटता। नाटक के माध्यम से संदेश दिया गया है कि जहां लोग अपने छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए झूठ बोलते हैं और वादों को तोड़ देते हैं। वहीं एक चोर सच बोलने और वचन निभाने के लिए अपनी जान दे देता है। इस मौके पर प्रो. प्रकाश नौटियाल, प्रो. महावीर नेगी, प्रो. आशा पांडे, डा. अजीत पंवार और डा. संजय पांडे आदि मौजूद थे।
नाटक के प्रमुख पात्र
हरीश नेगी, अंशुमान पुंडीर, साक्षी, शिखा, राघव, सलोनी, अनुष्का, आयुष, कमलेश, अमन, तन्वी रावत, अमन, ऋषभ, राहुल, वेदिका