अजब सिंह
पथरी।
रासायनिक उर्वरकों एवं दवाइयों के अंधाधुंध उपयोग को फसलों के लिए खतरनाक मानते हुए बिशनुपर कुड़ी गांव के किसानों ने जैविक खेती अपनाई है। इसके लिए गांव में 40 किसानों की टीम बनाई है। किसानों ने आगामी गेहूं की फसल भी जैविक विधि से उगाने का निर्णय लिया है।
बिशनपुर कुंडी के अधिकांश किसानों ने रासायनिक खादों से तौबा कर जैविक खेती अपना ली है। किसान पहले से ही जैविक सब्जियां भी उगा रहे हैं। अब गन्ना, धान व गेहूं की फसल भी जैपिक विधि से ही उगाने का फैसला लिया है। इसके लिए गांव के 40 किसानों ने किसान समूह गठित किया है।
सतपाल, सोमपाल, सुरेंद्र, महावीर, प्रमोद आदि किसानों का कहना है कि वह जैविक खाद से तैयार सब्जियों को सब्जी मंडी व क्षेत्र में लगने वाले पैठ बाजारों में बेचकर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। सुखदेव पाल,गीतूराम, ब्रजपाल, रविंद्र, अनुज पाल आदि का कहना है कि उन्हें किसान समूह के माध्यम से सरकार की ओर से संचालित योजनाओं का लाभ मिल रहा है। इन दिनों खेतों में जैविक खाद से तैयार करेला, कद्दू, लौकी, तोरी,भिंडी, टमाटर आदि सब्जियों की फसल खड़ी है। किसान समूह के अध्यक्ष सुखदेवपाल का कहना है कृषि विभाग के अधिकारी व कृषि वैज्ञानिक खेतों में आकर जैविक खाद से तैयार फसलों को देख चुके हैं।
यह होती है जैविक खेती की प्रक्रिया
धनौरी कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डा. योगेंद्र पाल सैनी ने बताया कि जैविक खेती एक ऐसी पद्धति है, जिसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और खरपतवार नाशकों के स्थान पर जीवांश खाद पोषक तत्वों (गोबर की खाद कंपोस्ट, हरी खाद, जीवाणु कल्चर, जैविक खाद आदि) जैव नाशियों (बायो-पैस्टीसाइड) व बायो एजेंट जैसे क्राईसोपा आदि का उपयोग किया जाता है। इससे न केवल भूमि की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक बनी रहती है, बल्कि पर्यावरण भी प्रदूषित नहीं होता है। कृषि लागत घटने व उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ने से कृषक को अधिक लाभ भी मिलता है। जैविक खेती वह सदाबहार कृषि पद्धति है, जो पर्यावरण की शुद्धता, जल व वायु की शुद्धता, भूमि का प्राकृतिक स्वरूप बनाने वाली, जल धारण क्षमता बढ़ाने वाली, धैर्यशील कृत संकल्पित होते हुए रसायनों का उपयोग आवश्यकता अनुसार कम से कम करते हुए कृषक को कम लागत से दीर्घकालीन स्थिर व अच्छी गुणवत्ता वाली पारंपरिक पद्धति है।