श्रीनगर। हिमालय मीट के मसौदे पर चर्चा के लिए जुटे विशेषज्ञों ने हिमालयी राज्यों को आक्सीजन हब के रूप में विकसित किए जाने की बात कही। वक्ताओं ने उत्तराखंड सरकार की ओर से बनाई जा रही हिमालयी नीति का भी स्वागत करते हुए सीमांत क्षेत्रों के खाली होने पर चिंता जताई।
सितंबर माह में उत्तराखंड सरकार की ओर से आयोजित होने वाले हिमालय मीट (हिमालयी क्षेत्रों के मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन) के मसौदे पर बृहस्पतिवार को विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ जुटे। गढ़वाल विवि के समाज कार्य एवं समाज शास्त्र विभाग में पर्वतीय विकास शोध केंद्र की पहल पर आयोजित परिचर्चा में वक्ताओं ने आबादी घनत्व निर्धारण पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 67 फीसदी वन क्षेत्र को शामिल कर आबादी घनत्व का निर्धारण उचित नहीं है। सिर्फ नापभूमि के आधार पर घनत्व निकाला जाना चाहिए। वहीं पर्यावरणविद् जगत सिंह चौधरी जंगली ने कहा कि हिमालयी राज्यों को ऑक्सीजन हब के रुप में विश्व पटल पर प्रस्तुत करना होगा। समाज शास्त्र विभाग के एचओडी प्रो. जेपी पचौरी ने हिमालयी राज्यों के लिए पृथक रोजगार नीति पर जोर दिया। सैन्य विज्ञान विभागाध्यक्ष डा. राकेश कुंवर ने कहा कि पलायन रोकने के लिए स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार उपलब्ध कराया जाना चाहिए। पर्वतीय विकास शोध केंद्र के नोडल अधिकारी डा. अरविंद दरमोड़ा ने बताया कि हिमालयी राज्यों के 200 बुद्धिजीवी 2010-11 में ही हिमालय लोक नीति का मसौदा तैयार कर चुके हैं। बताया कि हिमालय लोक नीति को पुन: प्रधानमंत्री सहित हिमालयी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भेजा जाएगा। इस मौके पर डा. मोहन पंवार आदि मौजूद रहे।