ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
महापुरुष सबके होते हैं और उन्हें किसी एक जाति और वर्ग से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। डॉ. भीमराव अंबेडकर देश के संविधान निर्माता ही नहीं हैं, बल्कि आजादी के बाद विदेश नीति में भी उनका खासा योगदान रहा। यह बातें मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने शनिवार को परेड ग्राउंड में दून बुद्धिस्ट सोसायटी की ओर से आयोजित भीम महोत्सव का शुभारंभ करते हुए कहीं।
उन्होंने कहा कि अगर आजादी के बाद सांस्कृतिक आधार पर अंतरराष्ट्रीय संबंध बनाने के प्रयास हुए होते तो कई समस्याओं का समाधान हो जाता। उन्होंने कहा कि नेपाल हिंदू राष्ट्र है। तिब्बत, चीन और जापान में बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। बौद्ध धर्म की जड़ भारत में ही है। बौद्ध धर्म भारत में ही प्रफुल्लित हुआ है। इसमें भारत की मिट्टी की सुगंध है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जिस काल और परिस्थितियों में जन्म लिया, उस समय छुआछूत चरम पर था। उस समय डॉ. अंबेडकर के समक्ष मुस्लिम, ईसाई आदि धर्म अपनाने का भी दबाव रहा, लेकिन उन्होंने देश एवं समाज हित में बौद्ध धर्म अपनाया। साथ ही बुद्ध की शिक्षाओं को ग्रहण कर बुद्धं शरणं गच्छामि का अनुसरण किया।
इस धर्म की अच्छाइयों को समझकर छुआछूत को मिटाने और मनुष्यों में भेदभाव न करने की भी शिक्षा उन्होंने दी। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज बुद्ध की शिक्षाओं को समझने की जरूरत है। मुख्यमंत्री ने भीम महोत्सव के आयोजन के लिए दून बुद्धिस्ट सोसायटी को परेड ग्राउंड स्थित आयोजन स्थल निशुल्क उपलब्ध कराने की भी सहमति दी। विधायक देशराज कर्णवाल ने कहा कि बुद्ध शांति के प्रतीक हैं। डॉ. भीमराव अंबेडकर महिला शिक्षा के हिमायती रहे। इस मौके पर दून बुद्धिस्ट सोसायटी के अध्यक्ष राजेश सिंह, पूर्व आईएएस चंद्र सिंह, संतलाल आदि मौजूद रहे।