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वेद ऋचाओं की गूंज से पवित्र हुआ वातावरण

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ब्यूरो/अमर उजाला, विकासनगर
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नगर के विद्यापीठ मार्ग स्थित रिसोर्ट में सोमवार को शुरू हुए राष्ट्रीय वेद सम्मेलन में चारों वेदों की ऋचाओं के सस्वर गायन ने वातावरण को पवित्र बना दिया। राजस्थान से आए डॉ. सीताराम त्रिपाठी ने शंख ध्वनि से सम्मेलन की शुरुआत की। शंख ध्वनि से माहौल को भक्तिमय बनाने के साथ ऋचाओं के सस्वर गायन से वेदों की ओर लौटने का संदेश दिया गया। दो दिवसीय सम्मेलन में एक ओर विभिन्न संकेत मुद्राओं के साथ ऋचाओं का गायन हो रहा है, वहीं दूसरी ओर वेद ज्ञाता वेदों के महत्व और मानव जाति के लिए उनकी उपयोगिता पर व्याख्यान दे रहे हैं।
संस्कृत विश्व विद्यालय हरिद्वार के कुलपति पीयुषकांत दीक्षित ने अपने व्याख्यान में कहा सनातन धर्म के सभी दर्शन, उपनिषद और पुराणों का मूल वेदों में निहित है। सनातन धर्म में वैदिक विधि विधान से संपन्न होने वाले अनुष्ठानों का धार्मिक महत्व के साथ ही वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व भी है। उन्होंने कहा कि देवभूमि उत्तराखंड पौराणिक काल से ही प्राकृतिक और पर्यावरण की दृष्टि से सुंदर होने के कारण ऋषि मुनियों और देवताओं की तप स्थली रही है। इसीलिए आदि गुरु शंकराचार्य ने वेदों के प्रचार प्रसार के लिए इसी भूमि का चयन किया। राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान रघुनाथ कीर्ति परिसर देवप्रयाग के प्रधानाचार्य प्रो. केबी सुब्बा रायडू ने बताया कि वेदों का संबंध मानव जीवन से है। भारत की प्रतिष्ठा वेदों से ही संभव है। लिहाजा वेदों का प्रचार प्रसार प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।
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चारों वेदों में सबसे प्राचीन है ऋग्वेद
ऋग्वेद : इस को चारों वेदों में सबसे प्राचीन माना जाता है। इसको दो प्रकार से बांटा गया है। प्रथम प्रकार में इसे 10 मंडलों में विभाजित किया गया है। मंडलों को सूक्तों में, सूक्त में कुछ ऋचाएं होती हैं। कुल ऋचाएं 10520 हैं। सृष्टि के अनेकों रहस्यों का इनमें उल्लेख किया गया है। पहले इसकी 21 शाखाएं थीं। लेकिन, वर्तमान में इसकी शाकल शाखा का ही प्रचार है।
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महर्षि वेद व्यास ने किया कृष्ण यजुर्वेद का संकलन
यजुर्वेद : इसमें यज्ञ कर्म की प्रधानता है। प्राचीन काल में इसकी 101 शाखाएं थीं। लेकिन, वर्तमान में केवल पांच शाखाएं काठक, कपिष्ठल, मैत्रायणी, तैत्तिरीय, वाजसनेयी ही हैं। इस वेद के दो भेद हैं - कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद का संकलन महर्षि वेद व्यास ने किया है। इसका दूसरा नाम तैत्तिरीय संहिता भी है। शुक्ल यजुर्वेद को सूर्य ने याज्ञवल्क्य को उपदेश के रूप में दिया था। इसमें 15 शाखाएं थीं, परन्तु वर्तमान में वाजसनेयी ही प्राप्त है। इसमें 40 अध्याय, 303 अनुवाक एवं 1975 मंत्र हैं। इसका अंतिम अध्याय ईशावास्योपनिषद है।
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भारतीय संगीत का मूल है सामवेद
सामवेद : यह भारतीय संगीत का मूल है। ऋचाओं के गायन को ही साम कहते हैं। इसकी 1001 शाखाएं थीं। लेकिन, वर्तमान में तीन कोथुमीय, जैमिनीय और राणायनीय ही प्रचलित हैं। इसको पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक में बांटा गया है। पूर्वार्चिक में आग्नेय कांड, ऐन्द्र कांड, पवमान कांड और आरण्य कांड सहित चार कांड हैं। उत्तरार्चिक को 21 अध्यायों में बांटा गया। सामवेद में कुल 1875 मंत्र हैं।
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अथर्ववेद में वर्णित है गणित और विज्ञान
अथर्ववेद : इसमें गणित, विज्ञान, आयुर्वेद, समाज शास्त्र, कृषि विज्ञान आदि अनेक विषय वर्णित हैं। कुछ लोग इसमें मंत्र-तंत्र भी खोजते हैं। यह वेद जहां ब्रह्म ज्ञान का उपदेश करता है। वहीं, मोक्ष का उपाय भी बताता है। इसे ब्रह्म वेद भी कहते हैं। यह 20 कांडों में विभक्त है। प्रत्येक कांड में कई-कई सूत्र हैं और सूत्रों में मंत्र हैं। इस वेद में कुल 5977 मंत्र हैं। इसकी आजकल दो शाखाएं शौणिक एवं पिप्पलाद ही उपलब्ध हैं।
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सम्मेलन में देश भर से पहुंचे विद्वान
विकासनगर में आयोजित वेद सम्मेलन में उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, बिहार, गुजरात एवं मध्य प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों से वेदों के जानकार शामिल हुए हैं।
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