उसके सपने मूल निवास प्रमाण पत्र नामक अंधेरी सुरंग में फंस गए हैं। वह नेपाल मूल की है लेकिन उसने अपनी पलकों को उठाकर पहली मर्तबा हिंदुस्तान की सरजमीं को ही निहारा है। उसने यहीं पढ़ना-लिखना और बोलना सीखा। उसके पिता ने मजदूरी करके उसे इस काबिल बनाया कि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके लेकिन एक नियम ने उसके ख्वाबों के रंग को स्याह कर दिया है।
नेपाल छोड़ आए
गैरसैंण में रहने वाली माहेश्वरी बिष्ट के पिता अमर सिंह 40 साल पहले पेट की खातिर काली नदी पार कर नेपाल छोड़ आए। भारत में पसीना बहाकर बच्चों को शिक्षा दिलाई लेकिन उनकी बेटी की शिक्षा बेकार साबित हो रही है। वर्ष 2011 में माहेश्वरी ने गढ़वाल विश्वविद्यालय से बीएड की डिग्री ली।
इसके बाद सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने लगी। जहां भी जाती है उससे मूल निवास प्रमाण पत्र मांगा जाता है। माहेश्वरी बताती है कि वह पिछले चार वर्षों से पटवारी और स्थानीय प्रशासन के चक्कर काट-काट कर थक गई है। तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी खंडूडी के जनता दरबार में भी गुहार लगा चुकी है लेकिन मदद नहीं मिली।
गैरसैंण में समुदाय के किसी व्यक्ति ने गोरखाली सुधार सभा की जानकारी दी तो वह उम्मीदों का पहाड़ लिए देहरादून चली आई। यहां आकर मालूम हुआ कि उसी की तरह समुदाय के सैकड़ों नौजवान वर्षों से ठोकरें खाकर अपना सपना तोड़ चुके हैं। बुधवार को उसे जब पता चला कि देहरादून में नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा आ रहे हैं तो वह डिग्री लेकर उनसे मिलने आ गई।
भविष्य बरबाद होता दिखा
उसने देउबा से अपनी दास्तां बताई तो उन्होंने मदद का आश्वासन दिया है। इसके बाद वह बोझिल आंखों से गैरसैंण के लिए रवाना हो गई। माहेश्वरी के दो छोटे भाई दसवीं और बारहवीं में पढ़ रहे हैं। उसकी आंखों में अपना ही नहीं अपने दोनों भाइयों का भी भविष्य बरबाद होता दिख रहा है। लेकिन उसे विश्वास है कि समुदाय के उत्थान के लिए बने संघ और फ्रंट उसकी मदद करेंगे।
यह दास्तां अकेली माहेश्वरी की नहीं है। उसी के जैसे हजारों उन नौजवनों की है जिनके माता-पिता रोजगार की तलाश में भारत आ गए और यहीं के होकर रह गए। आज उनके बच्चे पढ़ लिखकर मूल निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।
माहेश्वरी पिछले एक हफ्ते से देहरादून में मुख्यमंत्री से मुलाकात करने के लिए रुकी थी, लेकिन सीएम ने समय नहीं दिया। एक अनुमान के मुताबिक इस समस्या से उत्तराखंड में तकरीबन 20 हजार नौजवान प्रभावित हैं।
- सूर्य विक्रम शाह, राष्ट्रीय अध्यक्ष, गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट