दारुल उलूम देवबंद की ओर से लगभग छह माह पहले मदरसों में मल्टीमीडिया मोबाइल पर पाबंदी लगाने के बाद अब देहरादून में भी इस पर अमल किया जा रहा है।
देहरादून में भी कई मदरसों द्वारा मल्टीमीडिया मोबाइल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
वहीं, उलेमाओं की ओर से भी मदरसे में मल्टीमीडिया मोबाइल पर लगी पाबंदी को जायज ठहराते हुए इसका स्वागत किया जा रहा है।
एक कार्यक्रम में दून पहुंचे दारुल उलूम के सदर मुफ्ती अहसान कासमी ने बताया कि विद्यार्थियों का 18 से 25 वर्ष की आयु का दौर सबसे ज्यादा मुश्किल होता है।
इस दौरान विद्यार्थी इस्लामिक पढ़ाई में पूरा ध्यान लगाएं तो कामयाबी आसान है लेकिन मल्टीमीडिया मोबाइल से भटक गया तो उसे रास्ता दिखाना बेहद मुश्किल काम है।
उन्होंने इस्लामिक नजरिए से भी मल्टीमीडिया मोबाइल को गलत करार दिया।
कासमी ने बताया कि गैर इस्लामिक होने के कारण इस पर पाबंदी लगाई गई है। खासकर इसके कैमरे और वीडियो विकल्प की वजह से छात्रों के गलत संगत में पड़ने का खतरा रहता है।
उन्होंने किसी गैर मर्द या औरत की अश्लील क्लिपिंग देखने को इस्लामिक नजरिए से हराम करार दिया। दारुल उलूम में लगी पाबंदी के बाद अब दून के मदरसों ने भी इस पर अमल किया है।
उलेमाओं की मानें तो दून के भी अधिकांश मदरसों में मल्टीमीडिया मोबाइल पर पाबंदी लगाई जा चुकी है।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में भी एक मदरसे ने फेसबुक के इस्तेमाल को रोकने के लिए विद्यार्थियों के मल्टीमीडया फोन इस्तेमाल करने पर बैन लगा दिया था।
मदरसा प्रबंधन ने छात्रों से मल्टी मीडिया मोबाइल फोन जब्त कर आग में नष्ट कर दिए थे।