आज भी छुट्टी पर घर आया सैनिक किसी जरूरी काम या आफत में फंसने पर छुट्टी बढ़ाने के लिए तार संदेश का उपयोग करता है।
सीमा पर तैनात सैनिक तथा उसका परिवार आज भी खुशी या गम साझा करने के लिए तार से संदेश भेजते हैं। उत्तराखंड में सबसे कम करीब 2350 सेवारत सैनिकों की मौजूदगी वाले इस जनपद में उत्तरकाशी टेलीफोन एक्सचेंज से महीने में औसतन 30 तार संदेश आते व जाते हैं।
सियाचीन ग्लेशियर में वर्ष 1997 में सेवाएं दे चुके सेवानिवृत्त मेजर आरएस.जमनाल कहते हैं कि उस क्षेत्र की अग्रिम चौकियों में सैनिक व उनके परिवार के बीच सुख-दुख की जानकारी देने-लेने का इकलौता माध्यम तार संदेश ही हैं।
हालांकि वहां सैटेलाइट फोन भी हैं, जिसे बारी-बारी से सभी पोस्टों तक पहुंचाने की व्यवस्था है। लेकिन एक पोस्ट की बारी कभी 15 दिन में आती है। सैटेलाइट फेल होने पर समस्या और बढ़ जाती है।
उन्होंने इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया कि जब अमेरिका सहित दुनिया के कई विकसित देश तार की पुरानी मोर्स कोड तकनीकी को न सिर्फ अपना रहे हैं बल्कि उसे बढ़ावा भी दे रहे हैं तो भारत सरकार का इसे बंद करने का औचित्य समझ से परे है।
सुरक्षा की दृष्टि से यह आत्मघाती कदम है। उनका कहना है कि यदि कोई दुश्मन देश हमारी सैटेलाइट आदि आधुनिक सुरक्षा प्रणाली को निष्क्रिय कर दे तो हम मोर्स कोड वाली पारंपरिक प्रणाली से काम चला सकते हैं। इसके संदेश को डिकोड करना भी आसान न होने से यह विश्वसनीय सूचना प्रणाली है। शायद इसी को ध्यान में रखकर विकसित यूरोपीय देश इसे जिंदा रखे हुए हैं।
बदल गया है टेलीग्राम का स्वरूप
डाकघर से 31 मई 1990 को भारत संचार निगम के सुपुर्द की गई टेलीग्राम सेवा का स्वरूप अब बदल गया है। पहले तार भेजने के लिए मोर्स कोड प्रणाली डाकघरों में थी। अब ऑन लाइन सेवा के तौर पर चल रही है। उत्तरकाशी से एक रुपये प्रति शब्द तथा न्यूनतम 30 रुपये प्रति संदेश वसूल कर संचार निगम फैक्स अथवा टेलीफोन पर अपने देहरादून मुख्यालय भेजता है। वहां से उसे गंतव्य तक भेजने की व्यवस्था होती है।