इस जिंदगी के बाद स्वर्ग में मोक्ष की चाह सैकड़ों यात्रियों को देवभूमि खींच लाई, लेकिन काल ने समय से पहले ही मोक्ष के द्वार दिखा दिए। जब तक भोले के दरबार में मौत का तांडव नहीं मचा था, तब तक श्रद्धालु मंदिर पहुंचने में असमर्थ परिचितों को फोन ऑन कर शाम की आरती सुना रहे थे, लेकिन प्रकृति की एक दहाड़ से आरती चीखों में बदल गई।
मोक्ष की चाह में निकले लोगों का तो पता नहीं लेकिन परिचित अपनों की खोजबीन में जरूर बदहवाश यहां-वहां दौड़ रहे हैं। कामधंधा छोड़ अपनों को ढूंढने के लिए देशभर से लोग उत्तराखंड पहुंच रहे हैं।
मेरठ से सतीश शर्मा अपने भाई गिरीश शर्मा और भाभी प्रमिला शर्मा को ढूंढने के लिए आए हैं। शनिवार को उनकी लास्ट लोकेशन गौरीकुंड के आसपास थी। तीन दिन तक संपर्क नहीं हुआ तो सतीश उत्तराखंड पहुंच गए। यहां के हालत देखे तो दिल बैठ गया। अनजान शहर में कचहरी से लेकर आपदा प्रबंधन केंद्र तक वह सबकुछ ढूंढ आए लेकिन उनके भाई-भाभी का कहीं पता नहीं चल सका है।
रास्ते में लैंड स्लाइड शुरू हो गया
बहराइच यूपी से विजय कुमार मित्तल परिवार समेत 50 परिचितों के साथ चारधाम यात्रा पर निकले थे। गंगोत्री से दर्शन कर बमुश्किल 7 किमी ही दूर पहुंचे थे कि रास्ते में लैंड स्लाइड शुरू हो गया। तीन दिन धनोली गांव में शरण लेने के बाद सरकारी मदद पहुंची तो 36 लोग ही वापस पहुंच सके। विजय के पिता, पत्नी और बेटी समेत अभी भी 14 लोग हर्षिल में फंसे हैं।
उम्मीद अभी जिंदा है
हैलीपैड में बैठी जयपुर से आई मधु अग्रवाल पति विकास अग्रवाल के साथ 27 परिचितों का इंतजार कर रही है। मधु के सभी परिचित आपदा वाली रात केदारनाथ में थे, तब से किसी का पता नहीं चल सका है। कमोबेश यही हाल रायपुर छत्तीसगढ़ से आए ओमप्रकाश का भी है। वह अपने गले में अपने परिचितों की फोटो लटकाकर हर आने वाले यात्री से पूछ रहे हैं। सुकून इस बात का है कि 4 सकुशल मिल गए हैं, 7 के मिलने की उम्मीद अभी जिंदा है।
किसी का भी पता नहीं चल पा रहा
मेरठ की कृष्णा वर्मा नौकरीपेशा हैं लेकिन भाई केदारनाथ में आई आपदा में गायब हुआ तो सबकुछ छोड़कर अकेले ही उसे ढूंढने निकल पड़ी। कृष्णा का भाई प्रभात गुप्ता कानपुर से चली तीन बसों में बतौर श्रद्धालु शामिल होकर आया था, लेकिन इनमें से किसी का भी पता नहीं चल पा रहा है। इन बसों में तकरीबन 90 लोग सवार थे।
ऐसे ही तकरीबन 60 लोग उम्मीदों का गुब्बार लिए सहस्त्रधारा हैलीपैड पहुंचे और नम आंखों से लौट गए कल फिर आने के लिए। इन लोगों में प्रशासन की बेरुखी को लेकर गुस्सा भी है और अपने खोए हुए लोगों के लिए दर्द भी।