बहुगुणा सरकार ने केदारघाटी आपदा को देखते हुए नदियों के किनारे निर्माण पर नई नीति बनाने का ऐलान किया है। इस कदम का ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ कहकर स्वागत किया जा सकता था। लेकिन गंगा जैसी नदी के 200 मीटर के दायरे में तो निर्माण पर पहले ही प्रतिबंध है।
औचित्य पर सवाल उठने स्वाभाविक
ऐसे में सरकारी घोषणा के औचित्य पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। इसके अलावा नदियों के किनारे जितने भी निर्माण हुए सभी में सियासी सरपरस्ती हासिल रही। एक और सवाल उठ रहा है कि नए निर्माण की अनुमति नहीं मिलेगी लेकिन उन निर्माणों का क्या होगा जो बरसों से नदियों के प्रवाहपथ और 200 मीटर के दायरे में बने हुए हैं।
कुदरत कानून को धता बताकर सियासी सरपरस्ती हासिल करके बहुतों ने नदी किनारे घर-दुकान और व्यावसायिक स्थल बना लिए। अब कुदरत उन्हें तबाह करने पर तुली है। हालांकि इन पीड़ितों में कई ऐसे निर्दोष लोग हैं जो इनके झांसे में आकर अपनी जमा-पूंजी नदियों के किनारे अपने आशियाने बनाकर गंवा दी।
निर्माण का सिलसिला जारी
बीते साल अगस्त की बाढ़ से असी गंगा तथा भागीरथी की तबाही से सबक सीखने के बजाय गंगोत्री से लेकर उत्तरकाशी चिन्यालीसौड़ तक भागीरथी की जलधारा को दूर धकेल कर निर्माण का सिलसिला जारी है। जिसमें कुछ अतिक्रमण तो 16 और 17 जून को गुस्साई भागीरथी ने हटा दिए, लेकिन कुछ अब भी प्रशासन को आइना दिखाने के लिए खड़े हैं।
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कांप्लैक्स ही खड़ा कर दिया। गंगोत्री से ही गंगा को प्रदूषित करने का काम किया। सैंज में पायलट बाबा आश्रम ने इस वर्ष भागीरथी के तट पर कब्जा करके इसमें कई निर्माण कराए, किंतु यह अतिक्रमण 16-17 जून को भागीरथी ने स्वयं हटा दिए।
गंगोरी तथा उत्तरकाशी में भी बीते साल अगस्त की बाढ़ से सबक न लेकर भागीरथी के रास्ते को रोककर अतिक्रमण शुरू कर कुदरत को चुनौती देने की कोशिश की जा रही है।
केदारघाट झूला पुल पर तो अगस्त की तबाही के बाद नदी के तट पर कब्जा कर एक घर अस्तित्व में आ गया। पुल के स्तंभ की आड़ इस घर को अभी बचा रही है और सरकारी अधिकारी तथा नगर पालिका इस अतिक्रमण से नजरें चुराते नजर आ रहे हैं।
कुछ नहीं बिगाड़ पाती सरकारी एजेंसियां
नदी की जमीन पर अवैध अतिक्रमण कर घर, होटल, दुकान बनाने के लिए नगर क्षेत्र में पालिका तथा प्रशासन और ग्रामीण क्षेत्र में राजस्व विभाग पर रोक लगाने की जिम्मेदारी है। सत्ता का संरक्षण पाए अतिक्रमणकारियों का कुछ नहीं बिगाड़ पा रही हैं। स्थिति यह है कि अकेले उत्तरकाशी में ही सैकड़ों निर्माण नदी के इर्द गिर्द हुए हैं।