19 अक्तूबर, 1965 से मुख्य डाकघर के घंटाघर स्थित केंद्रीय तारघर में चल रहे कार्यालय में कुछ सुस्ती सी पसरी है। बहुत लोग टेलीग्राम यानी तार कराने नहीं आते। दिन में केवल छह या सात तार बुक होते हैं। फिर भी 15 जुलाई से यह सेवा बंद किए जाने की खबर किसी के गले नहीं उतर रही।
खास तौर पर उन दो लोगों के, जिनकी जिंदगी पिछले 30-40 साल से तार के इर्द-गिर्द घूम रही है। तार काउंटर पर लंच के बाद फिर कुर्सी पर आ जमे तार बाबू रामशरण खबर पर यकीन नहीं कर पा रहे। फिर जैसे अपने को तसल्ली देते हुए कहते हैं, बंद होते-होते भी महीना लग जाएगा। बुकिंग ही तो बंद होगी। लेकिन जो तार सेट किए हुए हैं या जिनकी बुकिंग 14 जुलाई तक होगी, वह तो डिलीवर किए ही जाएंगे।
...काश एक साल और मिल जाता
तारघर में सीनियर टेलीग्राफ असिस्टेंट (सीटीए) के पद पर तैनात रविंद्र तिवारी 50 के दशक में हैं। यहां काम करते हुए 35 साल से ऊपर हो चुके हैं। रिटायर होने में महज साल भर और बाकी है। मायूसी से कहते हैं कि काश साल भर बाद आती यह खबर। तारघर में रहते हुए तार नहीं होगा, यह सोच ही परेशान करने वाली है। हालांकि जिस तेजी से जमाना आगे बढ़ रहा है, उसे देखते हुए एक दिन तो यह होना ही था।
तारों की इंट्री में गुजर गई जिंदगी
रामनरेश गुप्ता अभी तक रजिस्टर में तारों की इंट्री करते रहे हैं। अब तार बंद हो जाएंगे तो उनका कार्य भी शिफ्ट हो जाएगा। क्या करेंगे यह अभी तय नहीं, पर इतना जरूर तय है कि तार से दूर होना उन्हें नहीं भा रहा।
...उस तार पर थी शादी की खबर
सेवलाकलां, चंद्रबनी निवासी सूबेदार मेजर लक्ष्मण क्षेत्री बताते हैं कि 1974 का वक्त था। जम्मू-कश्मीर फील्ड यूनिट के सीमांत इलाके में तैनाती थी। घर-परिवार की खबर के लिए तार की ही आस थी। इस बीच घर से एक तार मिला। क्या हुआ होगा, सोचकर दिल धक रह गया, लेकिन इसमें तो शादी तय होने की खबर आई थी। मन नाच रहा था। वह खुशी बयां नहीं की जा सकती।
वह रोमांच क्या अब महसूस किया जा सकता है। यूनिट का हर साथी शादी के लड्डू मांग रहा था। आज 64 साल की उम्र है, लेकिन वह दृश्य अब भी आंखों के आगे घूमता है। देश-दुनिया की खबर तो रेडियो है ही और अब टीवी की भी बारी है, लेकिन दुर्गम इलाके में जहां टावर नहीं या नो मैंस लैंड होने के चलते टावर के बावजूद मोबाइल पर बात की इजाजत नहीं, फौजी के लिए आज भी अपनों की खबर पाने का जरिया तो तार ही है। तार बगैर जिंदगी सूनी होगी।