क्रिकेट के प्रति लोगों के दीवानेपन ने अगर इस खेल के लिए एक ग्लैमराइज्ड बाजार खड़ा किया है, तो इसी खेल का दूसरा हिस्सा मायूस खड़ा है। भारत में भले ही ब्लाइंड क्रिकेट गुमनामी का अंधेरे में कहीं खो गया है, लेकिन दूसरे मुल्कों में ऐसा नहीं है।
दून में संपन्न हुए फर्स्ट इंटर जोनल क्रिकेट टूर्नामेंट फार द ब्लाइंड की अवार्ड सेरेमनी में खिलाड़ियों की जुबां एक ही सवाल था, आखिर इस खेल के प्रति सरकार और बीसीसीआई की आंखें क्यों बंद हैं?
क्रिकेट के लिए जीते हैं
दून स्कूल में रविवार को संपन्न हुए फर्स्ट इंटर जोनल क्रिकेट टूर्नामेंट फार द ब्लाइंड में हुनरमंद खिलाड़ी भी मिले और वे जोशेली खिलाड़ी भी जो हर तकलीफ को नजरअंदाज कर सिर्फ क्रिकेट के लिए जीते हैं। हालांकि, उन्हें इस खेल के प्रति सरकार और बीसीसीआई की बेरुखी हमेशा सालती है।
एक ओर पाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और नेपाल जैसे देशों में सरकार और क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ब्लाइंड क्रिकेट को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन यह खेल बेरुखी का शिकार है।
किसी स्तर से मदद नहीं
आलम यह है कि खेल के दौरान घायल होने पर खिलाड़ी को खुद ही अपना इलाज कराना पड़ता है। इस समय करीब 250 खिलाड़ी ब्लाइंड क्रिकेट एसोसिएशन से संबद्ध हैं। एसोसिएशन को टूर्नामेंट के आयोजन के लिए किसी स्तर से मदद नहीं मिलती।
हालांकि, इसके बावजूद इन खिलाड़ियों और एसोसिएशन का हौसला नहीं टूटा है। देहरादून में टूर्नामेंट का सफल आयोजन भी इसी बात का सबूत है। अवार्ड सेरेमनी के मौके पर वर्ल्ड कप खेल चुके पूर्व क्रिकेटर्स ने अपने अनुभव साझा किए।
मैंने भारत की टीम से तीन वर्ल्ड कप खेले हैं। बीसीसीआई की ओर से अभी तक ब्लाइंड क्रिकेटर्स को कोई तवज्जो नहीं दी गई है। अब ब्लाइंड क्रिकेट को पहचान दिलाने के लिए ब्लाइंड क्रिकेट एसोसिएशन के साथ मिलकर संघर्ष कर रहा हूं।
-मानवेन्द्र पटवाल, पूर्व क्रिकेटर
2006 में इस्लामाबाद में हुए वर्ल्ड कप में खेल चुका हूं। नौकरी से पैसे बचाकर शौक के लिए क्रिकेट खेलता हूं। सरकारी मदद पता नहीं कब मिलेगी।
- आशीष नेगी, क्रिकेटर
भारत में ब्लाइंड क्रिकेट में अपार संभावनाएं हैं, लेकिन इसे पहचान नहीं मिल पाई है। हमारे लड़के आस्ट्रेलिया के क्रिकेटर्स को मात दे सकते हैं, बस बीसीसीआई थोड़ा सहयोग करे।
-एमएल मिश्रा, पूर्व नेशनल टीम कोच