केदारघाटी में आई आपदा में सैकड़ों लोगों की मौत और हजारों के लापता होने के बाद कुदरत के कहर को लेकर चिंताओं के बीच यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि आखिर निषिद्ध क्षेत्र में नियमों को ताक पर रख कैसे निर्माण कर दिया गया।
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केदारनाथ वन्यजीव विहार की सीमा पर पिछले एक दशक में कंक्रीट का जंगल जिस तेजी से बढ़ा, उसने ही आपदा को इस कदर विनाशक स्वरूप दिया। निर्माणों पर आंखें बंद किए रहे वन और राजस्व विभाग के अधिकारी सब कुछ तबाह हो जाने के बाद भी चुप्पी साधे हुए हैं।
कोई नया निर्माण नहीं हो सकता था
रामबाड़ा और गौरीकुंड केदारनाथ वन्यजीव क्षेत्र में आते हैं। नियमानुसार यहां कोई नया निर्माण नहीं हो सकता था, लेकिन पिछले एक दशक में यहां बड़े पैमाने पर होटल, रेस्टोरेंट, दुकानें और मकान बना दिए गए। हैरत की बात यह रही कि न तो वन, न ही राजस्व विभाग ने कभी इन निर्माणों को रोकने की जहमत उठाई।
सरकारी लापरवाही का खामियाजा देशभर के के हजारों लोगों को 16 से 18 जून के बीच आई प्राकृतिक आपदा में जान गंवाकर उठाना पड़ा। हैरत की बात यह है कि इस तबाही के बावजूद शासन स्तर पर यहां सबक सीखने जैसी कोई बात नजर नहीं आ रही। सूत्रों की मानें तो शासन ने यहां फिर होटलों के निर्माण की बात कही है, जिससे सिस्टम पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
केदारनाथ वन्यजीव विहार की सीमा में कोई नया निर्माण नहीं हो सकता है। हजारों की संख्या में कैसे निर्माण हुए, इसकी जांच होनी चाहिए। जो भी दोषी अधिकारी पाए जाए, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
- गौरी मौलेखी, सदस्य सचिव पीएफए
रामबाड़ा और गौरीकुंड में ज्यादातर पुराने निर्माण है। वन्यजीव विहार बनने के पहले ही यहां ये सब निर्माण किए गए थे। क्षेत्र में नए निर्माणों के बारे में मुझे जानकारी नहीं है।
- बीपी गुप्ता, निदेशक नंदादेवी नेशनल पार्क
(नोट : केदारनाथ वन्यजीव विहार नंदादेवी नेशनल पार्क के क्षेत्र में ही आता है)
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