लोढ़ा समिति ने बीसीसीआई में सुधार के लिए जनवरी 2016 में अपनी सिफारिशें पेश की थीं। तब समिति ने बताया था कि सिफारिशें तैयार करने के लिए उसने 38 बैठकें कीं थीं। इसकी शुरुआत मई 2013 में आईपीएल में सट्टेबाजी की जांच से शुरू हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई का कामकाज देखने के लिए जनवरी 2017 में चार सदस्यीय प्रशासकों की समिति (सीओए) गठित की थी। आइए जानते हैं जानें कब क्या-क्या हुआ
कैसे हुई थी सुधार की शुरुआत?
- मई 2013 : आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग सामने आई। बुकीज, खिलाड़ियों और फ्रेंचाइजी सदस्यों के बीच साठगांठ सामने आई। अक्तूबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस मुकुल मुद्गिल की अगुआई में समिति गठित की। समिति ने तत्कालीन बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन की टीम चेन्नई सुपरकिंग्स और राजकुंद्रा व शिल्ला शेट्टी की सहमालिकान हक वाली राजस्थान रॉयल्स को दोषी माना।
ऐसे एक्शन में आए जस्टिस लोढ़ा
- जनवरी 2015: चेन्नई सुपरकिंग्स और राजस्थान रॉयल्स समेत आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग के दोषियों के खिलाफ सजा तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति बनाई। यहीं से जस्टिस लोढ़ा का रोल शुरू हुआ।
बीसीसीआई के लिए पहला बड़ा झटका
- जुलाई 2015: जस्टिस लोढ़ा ने छह महीने का समय लिया। चेन्नई सुपरकिंग्स और राजस्थान रॉयल्स की फ्रेंचाइजी दो साल के लिए प्रतिबंधित। चेन्नई के सीईओ व श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन और राजस्थान रॉयल के सहमालिक राज कुंद्रा के क्रिकेट से जुड़ी गतिविधियों में ताउम्र हिस्सा लेने पर रोक लगा दी।
आईपीएल के बाद जस्टिस लोढ़ा के निशाने पर बीसीसीआई
- जनवरी 2016 : स्पॉट फिक्सिंग मामले में सजा तय करने के बाद जस्टिस लोढ़ा ने छह महीने में 38 बैठकें कीं और जनवरी 2016 में बीसीसीआई में बड़े बदलाव की सिफारिशें कीं। ये सिफारिशें ऐसी थीं जिनसे बीसीसीआई में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों का बोर्ड पर कंट्रोल पूरी खत्म होने वाला था।
- जस्टिस लोढ़ा ने सिफारिश की कि एक स्टेट का एक वोट होगा। इससे पहले महाराष्ट्र, गुजरात जैसे राज्यों में तीन-तीन क्रिकेट संघ थे। उन सभी के वोट गिने जाते थे।
- यह भी कहा गया कि अधिकारियों का कार्यकाल फिक्स होगा। कोई मंत्री बीसीसीआई में पोस्ट नहीं ले सकेगा। 70 साल से ज्यादा उम्र का कोई भी शख्स बोर्ड में जिम्मेदारी नहीं संभाल सकेगा।