फैसला समीक्षा प्रणाली (डीआरएस) को लागू करने को लेकर बीसीसीआई और आईसीसी एक बार फिर आमने-सामने है। आईसीसी ने डीआरएस को द्विपक्षीय सीरीज में पूरी तरह लागू कराने के लिए इसकी मौजूदा नीति में बदलाव करने का सुझाव दिया है। जबकि बीसीसीआई इन सुझावों को मानने से इंकार कर दिया है।
आईसीसी के मुख्य कार्यकारियों की समिति (सीईसी) ने अपने सुझाव में कहा कि सीरीज के दौरान डीआरएस इस्तेमाल करने या न करने का फैसला लेने का अधिकार मेजबान क्रिकेट बोर्ड के पास होगा। इस सुझाव का बीसीसीआई को छोड़कर सभी सदस्य देशों ने स्वागत किया।
मौजूदा नीति के अनुसार किसी द्विपक्षीय सीरीज में डीआरएस लागू करने के लिए भाग लेने वाली दोनों टीमों की स्वीकृति आवश्यक होती है लेकिन यह सुझाव मान लिए जाने के बाद यह निर्णय लेना घरेलू बोर्ड का अधिकार होगा। सीईसी ने कहा है कि अब इस मामले पर निर्णय दुबई में 29 और 30 जनवरी होने वाली आईसीसी अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मुख्य कार्यकारी अधिकारी और 10 पूर्ण सदस्य बोर्ड के अध्यक्षों की बैठक में मतों के जरिए लिया जाएगा।
बैठक में भाग लेने वाले एक सदस्य ने कहा कि सीईसी ने बोर्ड से मौजूदा नीति पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया है। सीईसी के अधिकतर सदस्य डीआरएस नीति में बदलाव के पक्षधर हैं। बैठक में बीसीसीआई को छोड़कर किसी ने इस सुझाव का विरोध नहीं किया।
उधर बीसीसीआई सचिव संजय जगदाले ने डीआरएस पर किसी भी तरह की टिप्पणी करने से इंकार कर दिया। बीसीसीआई ने पहले भी कई बार डीआरएस का विरोध किया है। भारत इस प्रणाली का एकमात्र विरोधी रहा है। भारतीय बोर्ड का तर्क है कि डीआरएस में इस्तेमाल की जाने वाली मौजूदा तकनीक 100 प्रतिशत सटीक नहीं है।
बीसीसीआई के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन ने हाल में एक साक्षात्कार में भी कहा था कि वह डीआरएस के मामले में अपना निर्णय नहीं बदलने वाले हैं। उन्होंने कहा था कि मैं तकनीक के खिलाफ नहीं हूं लेकिन हमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि हम क्या पाना चाहते हैं। अगर आप कहें कि मेरे सही निर्णयों का प्रतिशत 94 और 95.6 प्रतिशत है, तो क्या हम यही पाने की कोशिश कर रहे हैं। अनिश्चितता ही क्रिकेट की खूबी है। हमें यह समझना होगा कि खेल की खूबसूरती क्या है। इसे ऐसे ही बने रहने देना चाहिए।