साल दर साल बीतते गए, गुजरते समय के साथ भारतीय क्रिकेट देश के लोगों की निगाहों में बसने लगा। मंसूर अली खान पटौदी, कपिल देव, बिशन सिंह बेदी और लाला अमरनाथ जैसे दिग्गज खिलाड़ियों ने देश के क्रिकेट को नई पहचान दिलाई और अपने खेल से भारतीय क्रिकेट को वह क्रांति दी जिसकी उसे दरकार थी।
युवा टाइगर पटौदी के नेतृत्व में भारतीय क्रिकेट टीम ने 1968 में डुनेडिन में न्यूजीलैंड को पांच विकेट से हराया। यह न केवल न्यूजीलैंड में भारत की पहली टेस्ट जीत थी, बल्कि विदेशी धरती पर भी भारत ने पहली बार जीत का स्वाद चखा। दो साल बाद टीम इंडिया ने 1970-71 में वेस्टइंडीज दौरे पर गई और पहली बार विदेशी जमीन पर भारतीय टीम ने अपनी पहली टेस्ट सीरीज जीती, जहां उन्होंने पांच मैचों की श्रृंखला में 1-0 से सितारों से सजी विंडीज टीम को हराया।
विंडीज के खिलाफ इस सीरीज को इसलिए भी याद किया जाता है, क्योंकि सुनील गावस्कर ने विंडीज के खतरनाक पेस अटैक के खिलाफ 774 रन बनाकर इस सीरीज से करियर की शानदार शुरुआत की थी।
इसके बाद से विश्व क्रिकेट पटल पर भारत तेजी से उभरने वाले देश के रूप में जाना जाने लगा, टीम इंडिया में ऐसे खिलाड़ी आए, किसी भी देश को कड़ी टक्कर देने का मद्दा रखते थे, लेकिन इसके बाद जो कुछ हुआ वह किसी ने नहीं सोचा था और इसे भारतीय क्रिकेट का महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।
साल 1983 इंग्लैंड और वेल्स में 9 जून से 25 जून तक क्रिकेट विश्व कप टूर्नामेंट का तीसरा संस्करण आयोजित हुआ। कपिल देव की कप्तानी में भारत ने प्रूडेंशियल कप के फाइनल में गत चैंपियन वेस्टइंडीज को हराकर दुनिया को चौंका दिया।
दो साल बाद 1985 में विक्टोरिया में यूरोपीय समझौता के 150 साल पूरे होने के अवसर पर ऑस्ट्रेलिया में क्रिकेट की विश्व चैम्पियनशिप आयोजित की गई। भारत ने फाइनल में चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को हराकर ट्रॉफी पर कब्जा किया।
वर्तमान में भारतीय क्रिकेट टीम के कोच और पूर्व खिलाड़ी रवि शास्त्री को प्लेयर ऑफ द सीरीज चुना गया था, जिन्होंने उस समय 182 रन और आठ विकेट अपने नाम किए थे। उन्हें इस ऑल-राउंड प्रदर्शन के लिए 'द चैंपियन ऑफ चैंपियंस' भी कहा गया।
इसके बाद भारतीय क्रिकेट के लिए वह दशक आया जिसने एक दिवसीय क्रिकेट में भारत को रंग दिया। शारजाह में क्रिकेट के मशहूर हस्तियों का मैच फिक्सरों के साथ रिस्तों की बातें सामने आने लगी।टीम इंडिया से गावस्कर का दौर खत्म होने के बाद क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर उभर आए और उन्हें भारतीय टीम में शामिल किया गया। 11 साल की उम्र में क्रिकेट की शुरुआत करने वाले तेंदुलकर ने 15 नवंबर 1989 को कराची में पाकिस्तान के खिलाफ 16 साल की उम्र में टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया।
अपने 24 साल के लंबे करियर में, तेंदुलकर एकमात्र खिलाड़ी हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय शतकों शतक बनाया है, सचिन ने एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय में दोहरा शतक बनाने वाले पहले बल्लेबाज हैं, जिनके नाम टेस्ट और वनडे दोनों में सबसे अधिक रन बनाने के रिकॉर्ड दर्ज हैं और इंटरनेशल क्रिकेट में 30,000 से अधिक रन पूरे करने वाले वह एकमात्र खिलाड़ी हैं। मजबूत बल्लेबाजी लाइनअप के बावजूद भारत 1992 विश्व कप में सिर्फ दो मैच ही जीत पाया और 1999 में इंग्लैंड की जमीन पर हुए वर्ल्ड कप में जिम्बाब्वे से हार गया।
भारत में बदलते क्रिकेट के साथ मोहम्मद अजहरुद्दीन, राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली, वीरेंद्र सहवाग, अनिल कुंबले, वीवीएस लक्ष्मण और युवराज सिंह जैसे कई धुरंधर क्रिकेटरों ने टीम इंडिया में जगह बनाई और विश्व क्रिकेट में अपने खेल से अमिट छाप छोड़ी।
इन सब के अलावा जो पल हर भारतीय क्रिकेट फैंस के दिल पर छाप छोड़ गया वह एक और विश्व कप की जीत थी, साल 2011 में 28 साल के सूखे को खत्म कर भारत दूसरी बार विश्व विजेता बना था।
धोनी ने अपने नेतृत्व में विश्व कप जीत भारतीय क्रिकेट में एक और क्रांति की नींव रखी। 2007 से 2016 तक सीमित ओवरों की कप्तानी में देश को कई खिताब दिलाए। धोनी ने 2008 से 2014 तक टेस्ट में टीम इंडिया की कमान संभाली, उन्हें टेस्ट क्रिकेट में महानतम कप्तानों में से एक माना जाता है।
उनकी कप्तानी में भारत ने 2007 आईसीसी विश्व टी-20, 2007-2008 की सीबी सीरीज, 2010 और 2016 एशिया कप, 2011 आईसीसी क्रिकेट विश्व कप और 2013 आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी जीतकर इतिहास रच दिया।
हालांकि, उनका नाम आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग मामलों मे जोड़ा गया, जो बाद में खारीज हो गया। कई उतार चढ़ाव के बाद वर्तमान में विराट कोहली के नेतृत्व में भारतीय टीम मजबूती से आगे बढ़ रही है और रोज नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है।