यह साल 1971 था जब भारत ने वेस्टइंडीज और इंग्लैंड को उसी के घर में पहली बार पटखनी देकर इतिहास रचा था। टीम के कप्तान अजीत वाडेकर को सिर आंखों पर बिठा लिया गया। यहां तक उन्हें उस वक्त देश का सर्वकालिक महान कप्तान करार दिया गया।
ठीक तीन साल बाद जब इन्हीं वाडेकर की कप्तानी में भारत को इंग्लैंड में तीन टेस्टों की श्रृंखला में 0-3 से हार मिली तो वह ऐसे खलनायक बने कि कप्तान बनना तो दूर फिर कभी भारतीय टीम में खेलने के लिए नहीं चुने गए। महेंद्र सिंह धोनी के सन्यास ने 40 साल पुरानी इस घटना को फिर ताजा कर दिया है। फर्क सिर्फ इतना है वाडेकर को हटाया गया और यहां धोनी खुद विदेशी धरती पर हार के बोझ तले दब गए और अचानक सभी को स्तब्ध करने का वाला निर्णय ले डाला।
यह पिछले तीन सालों में इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका में धोनी की कप्तानी में खेले गए 19 में से 14 टेस्ट मैचों में मिली हार का बोझ कहें या फिर दबाव जो उनके टेस्ट क्रिकेट से सन्यास के रूप में सामने आया है।