अमित के पिता विजेंदर ने कहा, 'जब उसने शुरुआत में बॉक्सिंग में रूचि दिखाई तब हम चिंतित थे। वह किसी खेल के हिसाब से काफी कमजोर नजर आता था। हालांकि, कोच धनकर ने उसकी दृढ़ता और इच्छाशक्ति की जमकर तारीफ की। हमें समझ आया और उन्हें रिंग में जाने की इजाजत दी। जब रिंग से जुड़ने के दो साल के भीतर अमित ने महाराष्ट्र में सब-जूनियर नेशनल्स में गोल्ड मेडल जीता तो हम सबको काफी गर्व महसूस हुआ। अमित भी जीत से काफी उत्सुक था और वह मेडल लेकर पूरे गांव में घूमा था।'
अमित को ट्रेनिंग कराने के लिए परिवार ने दोस्तों और रिश्तेदारों से उधार भी लिया था। कोच धनकर गुड़गांव के कॉम्बेट बॉक्सिंग क्लब में गए तो उन्होंने अमित को वहां ट्रेनिंग कराने के लिए उनके परिवार को राजी कर लिया। विजेंदर ने याद किया, 'हमारे परिवार की इतनी आय नहीं थी कि खर्चे उठा सकें। अमित के नेशनल जूनियर में गोल्ड मेडल जीतने के बाद मुझे अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से कर्जा लेना पड़ा ताकि उसकी ट्रेनिंग पूरी हो सके। कभी अमित घर आता था तो वह सिर्फ केला और दूध लेता था। वह कहता था कि उसे अपना वजन संभालना है। अमित की मां उसकी डाइट को लेकर चिंतित रहती थी।'
अमित के घर आने का परिवार बेसब्री से इंतजार कर रहा है। मां ने अमित का पसंदीदा चूरमा और खीर बनाने की योजना बनाई है।