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बांग्लादेश के लोकतंत्र की फिक्र

सुबीर भौमिक, वरिष्ठ पत्रकार Published by: सुबीर भौमिक Updated Mon, 04 Jun 2018 07:10 PM IST
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शेख हसीना
ठीक इसी समय जब बांग्लादेश सामाजिक और आर्थिक प्रगति के मामले में सफलता की कहानी लिख रहा है, पश्चिमी पंडितों ने इसके लोकतंत्र को लेकर खतरे की घंटी बजानी शुरू कर दी है। जर्मनी के बर्टलस्मैन फाउंडेशन ने अपने ट्रांसफॉर्मेशन इंडेक्स 2018(बीटीआई) में बांग्लादेश को कमतर आंकते हुए उसे लेबनान, मोजांबिक, निकारागुआ और युगांडा के साथ 'नई तानाशाहियों की सूची' में शामिल किया है।


इस रिपोर्ट में बांग्लादेश के बारे में कहा गया, चुनावों की बदतर स्थिति के कारण पूर्व के पांचवे सबसे बड़े लोकतंत्र को एक बार फिर से तानाशाही के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यहां तक कि भारत के एक टिप्पणीकार ने भी बांग्लादेश के आगामी चुनावों को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चुनौती करार दिया और लिखा कि वैश्विक समुदाय अपेक्षा कर रहा है कि इस वर्ष होने वाले संसदीय चुनावों को जनवरी, 2014 में हुए चुनावों की तुलना में कहीं अधिक निष्पक्ष और समावेशी होना चाहिए। वास्तव में यहां पर वैश्विक समुदाय की जगह पश्चिम कहना उचित होगा, जिसने बांग्लादेश के बारे में गलत ढंग से राय बना ली है। 


हेनरी किसिंजर ने बांग्लादेश को बॉस्केट केस (बेकार) कहा था। इस देश ने 2006 में जब पहली बार पाकिस्तान की जीडीपी वृद्धि दर को पार किया था, तब अधिकांश पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की राय सकारात्मक नहीं थी और उन्होंने इसे अनायास मिली सफलता करार दिया था। अब वे चुप हैं, वह भी तब जब बांग्लादेश के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर पाकिस्तान  से 2.5 फीसदी सालाना अधिक है। इस साल बांग्लादेश की जीडीपी की वार्षिक वृद्धि दर भारत को पीछे छोड़़ सकती है।  


1.1 फीसदी सालाना की दर से बांग्लादेश की जनसंख्या वृद्धि दर पाकिस्तान से काफी पीछे है, वहीं इसकी प्रति व्यक्ति सालाना आय पाकिस्तान की तुलना में तकरीबन 3.3 फीसदी अधिक दर से आगे बढ़ रही है। विश्व बैंक के अर्थशास्त्री कौशिक बसु कहते हैं कि 'बांग्लादेश के इस आर्थिक परिवर्तन के पीछे सामाजिक परिवर्तनों का बड़ा योगदान है, जिसकी शुरुआत महिलाओं के सशक्तीकरण से हुई थी, नतीजतन बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले में भी वहां स्थिति बेहतर हुई है।'बांग्लादेश में औसत उम्र 72 वर्ष हो चुकी है, जबकि भारत में यह 68 वर्ष और पाकिस्तान में 66 वर्ष है। 


इरशाद की अगुआई वाले सैन्य शासन के 1990 में पतन और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के बाद से बांग्लादेश में नियमित आम चुनाव  हो रहे हैं। 2014 से पहले तक वहां हर पांच वर्ष में सत्ता बदलती रही है। दिसंबर, 2008 में अवामी लीग के सत्ता में आने से पहले तक वहां किसी तटस्थ कार्यवाहक प्रशासक के अधीन चुनाव होते रहे। अवामी लीग ने संसद में निर्णायक बहुमत हासिल करने के बाद यह व्यवस्था खत्म कर दी। लेकिन यह व्यवस्था क्यों जरूरी थी?


दरअसल 2006 में सेना के समर्थन से देश की कमान संभालने वाले वाले कार्यवाहक प्रशासक ने तुरंत चुनाव कराने के बजाए दो वर्ष तक बांग्लादेश में बिना किसी जनादेश के शासन किया। उसने बांग्लादेश की दो शीर्ष राजनेताओं प्रधानमंत्री शेख हसीना और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया का राजनीतिक करियर खत्म करने की कोशिश की। उस दौरान इस 'माइनस टू एजेंडा' के खिलाफ पश्चिम से शायद ही कोई आवाज उठी, जोकि यह तर्क दे रहा था कि यूनुस जैसे बैंकर हसीना जैसी राजनीतिक की तुलना में बांग्लादेश का विकास कर सकते हैं। 


अवामी लीग के आठ साल के शासन ने इन स्वयंभू पंडितों को गलत साबित किया है। बांग्लादेश ने एक राजनीतिक सरकार के अधीन आर्थिक वृद्धि, सामाजिक समावेशन और जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में असाधारण उपलब्धि हासिल की हैं और 1971 के मुक्ति संग्राम के धर्मनिरपेक्ष बंगाली मूल्यों को बरकरार रखा है।
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लेकिन पश्चिम खासतौर से अमेरिका की प्रभावशाली पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने नोबेलजयी मोहम्मद युनूस ( क्लिंटन फाउंडेशन को दिए गए उनके चंदे की सीनेट कमेटी ने जांच की थी) की महत्वाकांओं को पूरी आजादी नहीं देने के कारण शेख हसीना को दंडित करना चाहती थीं।

अमेरिका और यूरोपीय देशों ने जनवरी, 2014 में हुए आम चुनावों को लेकर नाखुशी जताते हुए आशंका जताई थी कि इससे लोकतंत्र का मकसद पूरा नहीं होगा।


लेकिन यह पूछा जा सकता है कि बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) और उसकी सहयोगियों को चुनाव लड़ने से किसने रोका था! अमेरिकी दूत डैन मोजेन के समर्थन से बीएनपी नेता खालिदा जिया और उनके बेटे तारिक की दिलचस्पी हिंसक प्रदर्शनों के जरिये अवामी लीग को खत्म करने में थी, ताकि कार्यवाहक व्यवस्था फिर से कायम हो सके। उस समय रैलियों में कि गए हमलों में हसीना सरकार के वित्त मंत्री गुलाम किबरिया और श्रमिक नेता अहसानुल्ला मास्टर सहित अवामी लीग के अनेक कार्यकर्ताओं की मौत हो गई थी।


पश्चिम की शह पर बांग्लादेश को आजाद कराने में अहम भूमिका निभानी वाली पार्टी के सफाए की इन कोशिशों ने 1975 के सैन्य तख्तापलट की याद दिला दी थी, जब हसीना के पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीब और उनके तकरीबन समूचे परिवार की हत्या कर दी गई थी। यह लोकतंत्र की हत्या से कम नहीं था। लेकिन जब बीएनपी और जमात के नेताओं को हिंसक और उग्र प्रदर्शन को उकसाने के कारण, जिनमें सैकड़ों लोगों की जान तक चली गई थी, जेलों में बंद किया गया तो पश्चिम ने काफी विरोध जताया था।


भारत का बांग्लादेश में काफी कुछ दांव पर है, इसलिए रणनीतिक और आर्थिक कारणों से वहां एक दोस्ताना सरकार का होना उसके हित में है। लिहाजा नई दिल्ली को पश्चिम के दृष्टिकोण को तवज्जो नहीं देनी चाहिए। हमारे लोकतंत्रों की कुछ सीमाएं हो सकती हैं, लेकिन इसका कोई कारण नहीं है कि पश्चिम को हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता को कमतर करने की इजाजत दी जाए। पश्चिम की शह पर बीएनपी और जमात तटस्थ कार्यवाहक सरकार के अधीन चुनाव नहीं होने के कारण चुनाव बहिष्कार कर सकते हैं।


यदि भारत में चुनाव आयोग निर्वाचित सरकार के सत्ता में रहते हुए निष्पक्ष चुनाव करवा सकता है, तो ऐसा बांग्लादेश में क्यों नहीं हो सकता!
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