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प्लास्टिक के विरुद्ध

अनिल प्रकाश जोशी Updated Mon, 04 Jun 2018 07:07 PM IST
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अनिल प्रकाश जोशी
पर्यावरण दिवस की वैश्विक मेजबानी भारत के हिस्से में है और इस बार की थीम प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर है। दुनिया के बड़े अविष्कारों में 20वीं सदी के प्लास्टिक का मुकाबला शायद ही कोई और कर पाए। हम प्लास्टिक के उपयोग में इतनी बुरी तरह फंस चुके हैं कि दुनिया में प्रति व्यक्ति 45 किलोग्राम प्लास्टिक हर वर्ष उपयोग में लाता है।


दुनिया में हर वर्ष 500 अरब प्लास्टिक बैग का उपयोग होता है। हमने पिछले दशक में प्लास्टिक का जितना उपयोग किया, उतना पूरी पिछली सदी में नहीं किया होगा। आज प्रति मिनट 10 लाख प्लास्टिक की बोतलें उपयोग में लाई जाती हैं। प्लास्टिक ने तमाम अन्य उपयोगी साधनों का गला भी घोंट दिया। जैसे, कांच की जगह प्लास्टिक ने ले ली, मिट्टी के घड़ों की जगह प्लास्टिक की सुराही आ गई।


दुनिया का चार फीसदी तेल प्लास्टिक के उत्पादन हेतु खपाया जाता है। दुनिया में सबसे बड़ा प्लास्टिक उत्पादक देश चीन है, पर इसकी सबसे अधिक खपत जापान में है। मतलब पूरे एशिया और अफ्रीका से ज्यादा खपत इस छोटे से देश की है। दुनिया के इस बड़े कचरे के रिसाइकल के लिए कोई मानक नहीं है। वैसे जापान का दावा है कि वह इस कचरे का 77 फीसदी रिसाइकल करता है। यूरोप जैसा पर्यावरण प्रेमी महादेश भी मात्र 26 फीसदी प्लास्टिक ही रिसाइकल कर पाता है।


वैसे इन आंकड़ों में कितनी सच्चाई है, इस पर भी शंका है, क्योंकि अंततः इसे समुद्र के गर्भ में धकेल दिया जाता है, जिससे सालाना 13 अरब डॉलर का नुकसान होता है। उत्तरी प्रशांत महासागर में मछलियां 12,000 से 24,000 टन प्लास्टिक निगल जाती हैं, जिससे आंतों में घाव से लेकर उनकी मृत्यु तक हो जाती है। अध्ययन में पता चला है कि समुद्र की 268 विभिन्न प्रजातियां सीधे इस प्लास्टिक को झेल रही हैं। अपने देश में रोज 15,000 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जिनमें से मात्र 6,000 टन की वापसी हो पाती है।


इसका एक बड़ा हिस्सा धरती या समुद्र में समा जाता है। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उनकी खोज में एक ऐसा बैक्टीरिया है, जिसका भोजन ही प्लास्टिक है। यह खोज कितनी प्रभावी हो पाती है, यह तो समय ही बताएगा। प्लास्टिक का आर्थिक पक्ष इतना बड़ा है कि यह पूरे राजनीतिक/सामाजिक तंत्र को हिला सकता है। वर्ना इस बड़ी मुसीबत से छुटकारा पाने का एक ही रास्ता था कि सीमित उपयोगों के अलावा प्लास्टिक को त्याग दिया जाए।


साओ टोम व प्रिंसीपे जैसा छोटा-सा अफ्रीकी देश जब प्लास्टिक को त्यागने का साहस जुटा सकता है, तो दूसरे देश इसका प्रयोग सीमित क्यों नहीं कर सकते? यह इसलिए भी जरूरी है आज प्लास्टिक प्राणियों के शरीर में प्रवेश कर रहा है, जो हार्मोन सिस्टम पर प्रभाव डाल रहा है। प्लास्टिक के बर्तन माइक्रोवेव के रास्ते शरीर में आ ही रहे हैं, और इसके कुप्रभाव अगर कैंसर जैसे हों, तो सोचने की जरूरत है। गर्म होने पर प्लास्टिक जहरीली ग्रीनहाउस गैस का कारण भी बना हुआ है। 


वैसे सरकार ने 50 माइक्रोव से नीचे के प्लास्टिक उत्पादन पर लगाम लगाने की योजना बनाई है। कई राज्य भी इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। सरकारें अगर सचमुच प्लास्टिक के नुकसान से चिंतित हैं, तो उन्हें इसके उत्पादन को नियंत्रित करने के बारे में सोचना चाहिए।
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