पत्नी ने इस बार हाइटेक दिवाली मनाने का निश्चय किया है ओर मेरे देवता कूच कर गए हैं। मैं लिहाफ तानकर सोने का बहाना कर रहा था, तभी पत्नी ने खलल डाला, गुप्ता जी एक महीने से दिवाली की तैयारियों में जुटे हैं और आप चैन की नींद सो रहे हैं।
मैने कहा, पूरा वेतन, बोनस और पीएफ का लोन ले आया, पर दिवाली का स्वरूप हाइटेक हो नहीं पा रहा। बताओ, और क्या करूं?
करना क्या है, गुप्ता जी को पकड़ो। तीन बच्चों के पिता हो। तीन-तीन हजार के पटाखे भी एक-एक के लिए लाओगे, तो दस हजार इसी में निकल जाएंगे। घर तो मैंने सजा लिया है, पर मेरे और बच्चों की सजावट में दस हजार लगेंगे। बढ़िया मिठाइयां लाओगे, तो तीन हजार से कम में क्या आएंगी? फिर हम उपहार वगैरह देंगे, तभी तो पड़ोस में धाक जमेगी। मैं बोला, तीस-चालीस हजार रुपये की उधारी तो गुप्ता जी भी नहीं देंगे। महंगाई का जमाना है, थोड़ी किफायत से दिवाली मना लें, तो क्या बिगड़ जाएगा?
दिवाली जैसे त्योहार से पहले इतनी निराशा ठीक नहीं टिंकू के पापा। थोड़ा खुद को ऊपर उठाओ। गुप्ता जी से मिलो। ब्याज की चिंता नहीं है, पर दिवाली शानदार होनी चाहिए।
क्यों मेरा पटाखा बना रही हो? मैं एक बार से ज्यादा चल नहीं पाऊंगा, मैंने घिघियाकर कहा। आखिरकार गुप्ता जी को फोन लगाना ही पड़ा। वह कर्ज देने के लिए तैयार बैठे थे। हां, ब्याज समय पर चाहिए।
पत्नी की बांछें खिल गईं। वह बोली, ले आओ पूरे पचास हजार। हम किसी से कम नहीं हैं। मैं क्या जाता, गुप्ता जी खुद ही आ गए और रकम दे गए। पत्नी ने रुपये झटक लिए और ताबड़तोड़ सूची बनाने लगी।
इधर मेरा शरीर बर्फ हुआ जा रहा था। मुझे लगा, यह कॉलोनी मेरे रहने लायक नहीं है। ऊंचे लोगों के बीच मैं एक अदना गरीब फंसा हुआ हूं। पता नहीं, किस दिन मेरी सासों का तार टूट जाएगा। इसके बावजूद मैंने अपने भीतर बज रही मातमी धुनों को बंद किया और पत्नी के पीछे-पीछे बाजारों की खाक छानता रहा। आखिर हाइटेक दिवाली जो मनानी है।