जम्मू क्षेत्र में पाकिस्तान की ओर से हुई गोलाबारी पर काफी हायतौबा मची। नौ दिनों बाद गोलाबारी कम हुई, और इसे अपनी जीत घोषित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र के धमनगांव में एक चुनावी रैली में कहा, 'पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब मिल गया है, और दोबारा वह ऐसा करने की गुस्ताखी नहीं करेगा। हमारे जवानों ने उनका मुंह बंद कर दिया है।'
इसमें संदेह नहीं कि इस बार भारत की ओर से सख्त जवाबी कार्रवाई हुई, तो इसके पीछे विधानसभा चुनावों की बड़ी भूमिका है। मगर सरकार को इस संदर्भ में अपनी नीतियों को लेकर सतर्कता बरतनी चाहिए। 2003 से नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर जो संघर्ष विराम लागू है, वह पाकिस्तान की तुलना में भारत के लिए ज्यादा फायदेमंद है।
संघर्ष विराम के कारण भारत को नियंत्रण रेखा पर मजबूत बाड़ेबंदी तैयार करने में मदद मिली है, जिससे घुसपैठ काफी कम हो गई है। अमूमन पाकिस्तान की ओर से ऐसी गोलाबारी भारत में घुसपैठ करने वाले आतंकवादियों को कवर देने के उद्देश्य से होती है, मगर इस बार इसका उद्देश्य अलग भी हो सकता है। वर्ष 1997 से 2003 के दौरान सीमा पर जैसी खुली बमबारी हुई, वह काफी विध्वंसक थी। उस दौरान हर वर्ष भारत ने सेना के 90 से ज्यादा जवान और तकरीबन 30 नागरिक खोए। उसकी तुलना में इस समय की गोलाबारी तो कुछ भी नहीं है।
नियंत्रण रेखा पर बमबारी करने वाले वे लोग हैं, जो कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीकरण करना चाहते हैं। अतीत में ऐसी बमबारी का उद्देश्य यह दावा करना होता था, कि कश्मीर एक विवादित मसला है, जिसमें बाहरी हस्तक्षेप की जरूरत है। पूरे घटनाक्रम को बाहर से देखने वाले एलओसी पर अस्थिरता और युद्ध जैसे हालात के चलते पूरे क्षेत्र की अस्थिरता पर सवाल उठाने लगते हैं, और संभावित निवेशकों में भी डर पैदा होता है। अब पाकिस्तान को ही लें, अंदरूनी हालात की वजह से वहां प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की संभावनाएं न के बराबर हैं। जबकि भारत में मोदी सरकार के आने के बाद विदेशी निवेश में बढ़ोतरी की उम्मीदें बलवती होने लगी हैं।
सीमा पर गोलाबारी से पाकिस्तानी जनरलों को देश के सामने अपनी मुस्तैदी जाहिर करने का मौका मिलता है। ऐसे हालात में उत्तरी वजीरिस्तान में घरेलू आतंकवादियों पर कड़ी कार्रवाई करने के अमेरिकी दबाव को बेअसर करने में भी उन्हें मदद मिलेगी। यही वे लोग हैं, जिन्हें अपनी नीतियों के जरिये कमजोर करने की कोशिश हमें करनी होगी। ऐसे में अफगानिस्तान को लेकर पश्चिम की चिंताएं पाकिस्तान के लिए फायदेमंद साबित होंगी, क्योंकि न तो अमेरिका, और न ही यूरोप अभी इस्लामाबाद के प्रति कठोर रुख अपनाएगा।
इस्लामिक स्टेट के उदय ने इन आशंकाओं को और बढ़ा दिया है। जो उम्मीद कर रहे थे कि ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद इस्लामी कट्टरवाद की घटनाओं में कमी आएगी, उन्हें पहले से कहीं ज्यादा क्रूर आईएस आतंकवादियों ने झटका दिया है। पाकिस्तान में आईएस की जड़ें फैलने की पूरी आशंका है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने पहले ही आईएस का समर्थन करने की बात कही है। हो सकता है कि इसके पीछे उसका अंदरूनी झगड़ा हो, मगर यह डराने वाली स्थिति तो है ही।
भारत के संदर्भ में देखें, तो सरकार के सामने आसान विकल्प नहीं हैं। फिर सारे समाधान दीर्घकालिक ही हैं। पुरानी बीमारी की तरह पाकिस्तान को लेकर भी पूरी सावधानी जरूरी है। दरअसल 1991 के बाद से विभिन्न सरकारों ने पाकिस्तान को लेकर संपर्क साधने और नियंत्रण रखने की जो नीति अपनाई है, वही सबसे कारगर है। चाहे नरसिंह राव हों, गुजराल हों, वाजपेयी या मनमोहन सिंह, सभी प्रधानमंत्रियों को पाकिस्तान के रूप में एक ऐसे कपटी पड़ोसी से निपटना पड़ा, जो अपनी कारगुजारियों पर पर्दा डालने के लिए हमेशा अपने भू-राजनीतिक महत्व का फायदा उठाने की जुगत में लगा रहा।
पाकिस्तान को लेकर लगातार संपर्क की ऐसी नीति का मतलब 'भारत-पाकिस्तान भाई-भाई' से नहीं है। इसका उद्देश्य सिर्फ पाकिस्तान को उसके रवैये के नकारात्मक नतीजों से आगाह करने, और अच्छे व्यवहार को लगातार प्रोत्साहित करने की कोशिश से है। पाकिस्तान को यह संदेश 'जैसे को तैसा' की नीति के जरिये दिया जा सकता है, और कूटनीति के जरिये भी।
मगर हमें समझ लेना होगा कि पाकिस्तान के मामले में सेना एकमात्र विकल्प नहीं हो सकती। इसकी वजह सिर्फ पाकिस्तान का भी परमाणु शक्तिसंपन्न होना नहीं है, बल्कि पारंपरिक युद्ध में भी दोनों ओर जो सेना खड़ी होगी, उसकी संख्या लगभग बराबर होगी। वैसे में, वायुसेना और नौसेना के मामले में हम पाकिस्तान से मजबूत स्थिति में होंगे। पर 2002 और 2008 में हमने देखा कि भारतीय सेना युद्ध जैसी स्थिति से निपटने के लिए तैयार नहीं थी। हमारे सैनिकों की बहादुरी पर सवाल नहीं उठाया जा सकता, पर उनके पास जरूरी उपकरण और गोलाबारी का अभाव है।
पाकिस्तान को लेकर मोदी की वर्तमान नीति पूरी तरह गलत नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि इसकी दिशा क्या है, और इस्लामाबाद से इसे कैसी प्रतिक्रिया मिलती है। अब तक सब कुछ अच्छा रहा है। पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति कह चुकी है कि दोनों देशों में युद्ध जैसी कोई बात नहीं थी, और पाकिस्तान की ओर से गोलाबारी भी रोक दी गई है। मगर मोदी को 'जैसे को तैसे' वाली प्रतिक्रिया देते समय सतर्क रहना होगा, और यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सेना तक उनका संदेश गलत ढंग से न पहुंचे।
दरअसल हाल में सीमा सुरक्षा बल के जवानों द्वारा जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया देने के मामले भी सामने आए हैं। प्रधानमंत्री की छवि एक मजबूत नेता की है। मगर अपनी नीतियों के क्रियान्वयन के लिए उन्हें उपयुक्त साधनों की भी जरूरत होगी। पुराना पड़ चुका राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र तभी अपनी भूमिका निभा सकेगा, जब उसमें अपेक्षित सुधार किया जाएगा।