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सत्ता संग्राम में समाजवाद कहां

सुधीर विद्यार्थी
Updated Mon, 09 Jan 2017 07:37 PM IST
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सुधीर विद्यार्थी
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का भीतरी संग्राम किसी दिलचस्प नजारे से कम नहीं। हर पल तलवारबाजी का नया करतब। पिता-पुत्र, चाचा-भतीजा तथा बाहरी-भीतरी की बहसों और सत्तामुखी दांव-पेच के मध्य अगर कुछ अनुपस्थित है, तो वह सिर्फ समाजवाद। लेकिन इस दल के भीतर समाजवादी विचार या लक्ष्य की यह गैरहाजिरी कोई नया अजूबा नहीं। जिस राजनीतिक दल की भीतरी संरचना ही समाजवाद-विरोधी चरित्र का खुला आईना रहा हो, वहां ऐसे सवाल बेमानी ही हैं। एक समय भले ही राममनोहर लोहिया की तस्वीर को हाथ में थामकर इस दल का गठन किया गया हो, लेकिन वहां समाजवाद का उच्च लक्ष्य और सिद्धांत सिरे से गैरहाजिर बने रहे हैं और इसीलिए दल के भीतर सब कुछ व्यक्ति और परिवार केंद्रित बनते चले जाने को अभिशप्त बना रहा। राजनीति का आधार विचार है और इसलिए किसी भी समाजवादी नामधारी दल से यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि आखिर उस पार्टी की सोच और उद्देश्यों को हासिल करने के लिए उसका एजेंडा क्या है।


कैसी विडंबना है कि समाजवादी पार्टी के इस पूरे सत्ता संघर्ष में समाजवाद को कहीं गहरे जमींदोज करके सब कुछ व्यक्ति, परिवार और पार्टी में एकाधिकार पाने की लिजलिजी सिर फुटौव्वल तक महदूद कर दिया गया है। लेकिन क्या यह इस दल के जन्म के समय से ही लक्षित नहीं किया जा रहा था कि धीरे-धीरे एक परिवार ही समाजवाद का दुर्भाग्यपूर्ण प्रतीक बन गया? उन दिनों भी 'छोटे लोहिया’ कहे जाने वाले जनेश्वर मिश्र को मुलायम सिंह के नेतृत्व में लगभग हाशिये पर धकेल कर शो-पीस के तौर पर उपाध्यक्ष सरीखे करीब-करीब निष्क्रिय और गैरजरूरी पद पर कुर्सीनशीन कर दिया गया था। सच्चाई यह है कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय नामधारी अधिवेशनों में भी पदों की घोषणाओं के अलावा समाजवाद के लक्ष्य और आदर्शों की चर्चा गैरजरूरी बनी रही और इस पक्ष को उस दल के लगभग सभी सदस्यों और कर्ताधर्ताओं ने नितांत अर्थहीन मान लिया। समाजवादी पार्टी के नवघोषित राष्ट्रीय अध्यक्ष के उद्बोधन में समाजवाद की तनिक भी चर्चा नहीं। वहां सिर्फ यही जुमले चमकते-कौंधते रहे कि किसे राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष नामित किया जाए और किसे बाहर का रास्ता दिखाकर हिसाब बराबर हो। यदि इस दल के उद्देश्य में समाजवाद का एक कोना भी सुरक्षित रखा गया होता, तब ऐसे सत्ता संघर्ष पूरी तरह निरर्थक होते।


वर्ष 2017 तक आते-आते यह समाजवादी परिदृश्य ऐसा बन गया कि इस सपा में कोई समाजवादी नहीं बचा, सब मुलायमवादी और अखिलेशवादी बन गए। समाजवाद के पतन की यह एक और गौरवगाथा है, जो इतिहास के पृष्ठों पर और विरूपित होकर दर्ज हो गई है। देखा जाए, तो समाजवादियों के भीतर व्यक्तिगत संघर्ष और उनका वैचारिक विचलन नई बात नहीं। पीछे जाकर देखें, तो समाजवादी सिद्धांत और उसकी विचारधारा से यह स्खलन जॉर्ज फर्नांडिस के भाजपा से बेमेल मिलन के तौर पर साफ रेखांकित किया जा सकता था। यदि पिछड़ों की राजनीति की बात करने वाले समाजवादी दलित राजनीति से अपना तालमेल बिठाते, तो सामाजिक परिवर्तन की दिशा में बड़ी पहल की जा सकती थी। पर यह ऐतिहासिक कार्यभार प्रारंभ से ही समाजवादियों के सत्ता संघर्ष के चलते हास्यास्पद हो चुका है। इंदिरा गांधी का 'गरीबी हटाओ’ का नारा भी तो एक समय समाजवाद की लड़ाई की ओर ध्यान खींचता था। पर उसका जो हश्र हुआ, शायद उसी मुकाम पर लोहिया का समाजवाद भी जा पहुंचा है।
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