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हंसी जब हम पर हंसेगी

Tue, 06 Oct 2015 07:53 PM IST
आसिम अनमोल
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एक जमाना था, जब हम खुलकर हंसा करते थे। मगर आज ऐसे मुंह फुलाकर रहने लगे हैं कि मानो हंसने की तालीम ही भूल गए हैं। न जाने हमारी हंसी को किसकी नजर लग गई है। अब नजर लगने की बात पर यह भी कहना जरूरी है कि नजर लगी नहीं है, बल्कि हम-आप खुद नजर के होकर रह गए हैं। यकीनन हंसी के इर्द-गिर्द हमको होना चाहिए था। पर हम उलझनों के साथ रहने में इतने माहिर होते जा रहे हैं कि हंसी ने भी हमसे किनारा कर लिया है। उसने भी सोचा होगा कि इनके बीच जाकर हम अपनी परंपरा की बुनियाद को क्यों कमजोर करें!
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आज हम दूसरों को खुश देखकर सीआईडी बनकर उसकी जांच-पड़ताल करना नहीं भूलते। गलतफहमियों से उपजनेवाले नफरत के बीज को खाद-पानी देकर बड़ा करना याद रखते हैं। बुराइयों को जड़ से उखाड़ फेंकने के बजाय उसमें इजाफा करने में दिन-रात सिर खपाते रहते हैं। मगर खुद के जीवन की संतुष्टि के लिए हमें हंसना याद नहीं रहता।

याद रहे, हंसना एक कला है, और हम इस कला को भूलते जा रहे हैं। ऐसा लगता है, मानो हंसने के हमारे नजरिये ही हमारे नहीं रहे। हम गैरों के हिसाब से हंसने का प्रयास कर रहे हैं। हमारी अपनी हंसी तो बेगानी होती जा रही है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या इसकी वजह हमारा खुद पर न हंसना है?
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इस धोखे में नहीं रहा जा सकता कि बीरबल, मुल्ला नसरुद्दीन और गोनू झा का जमाना लौटकर आएगा। चेहरों की उड़ रहीं हवाइयों के पार जाकर क्लोजअप मुस्कान बनाने का अभ्यास हमें खुद करना होगा। हमें अपनी खोई मुस्कान वापस लानी होगी। दिखावे के ठहाके अब किसी काम के नहीं रहे। ऐसे ठहाके इंसान को और बीमार कर रहे हैं। अब ऐसी हंसी का फायदा ही क्या, जो डिप्रेस्ड कर दे।

इसलिए अब नफे-नुकसान की गिनती करना छोड़कर हंसने की प्लानिंग करनी होगी। यही हमें जीवन भर खुशहाल रख सकती है। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो हंसी हम आप पर हंस-हंस कर तंज कसेगी कि संसार में आकर तुमसे इत्तू-सा काम भी नहीं हुआ।
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