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चीन को उसी के खेल में मात देनी होगी, बता रहे हैं प्रशांत दीक्षित

प्रशांत दीक्षित
Updated Tue, 21 Jul 2020 05:05 AM IST
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एलएसी पर अधिकारियों ने की बैठक - फोटो : PTI

मुझे संदेह है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन की स्थिति को स्थापित करने की उसकी मांग को मानने और पूरा करने के भारी चीनी दबाव का सामना करने को लेकर हमारी आशंका सच होती दिख रही है। हालांकि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 17 जुलाई को पेंगांग त्सो के नजदीक जवानों से बात करते हुए भारतीय क्षेत्र की सुरक्षा के संबंध में राष्ट्र को बहुत मजबूत संदेश दिया, लेकिन उनका बयान यह मानने के लिए पर्याप्त था कि वह हमारे सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए समाधान की गारंटी नहीं दे सकते। उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों देशों को मामले को सुलझाना चाहिए।



लेकिन यह एक कठिन रास्ता होगा, कि कई विवादास्पद मुद्दे हैं। पेंगांग सेक्टर में ही बताया गया है कि 'चीनी सैनिकों ने भारत के अधिकार क्षेत्र में आठ किलोमीटर अंदर तक घुसपैठ कर ली है, जिसे फिंगर 4 कहा जाता है और जब तक भारत फिंगर 2 से वापसी नहीं करता, वे फिंगर 8 से वापस जाने से इन्कार कर रहे हैं।'


फिर चीनी सैन्य वार्ताकारों के आग्रह पर गलवां नदी पर पारिभाषित बिंदु को, जहां से विघटन शुरू हुआ था, पश्चिम की ओर भारत नियंत्रित क्षेत्र के भीतर ले जाया गया है। गलवां के दक्षिण में पीपी-15 और हॉट स्प्रिंग क्षेत्र में टकराव स्थल से चीन को पीछे हटने के लिए राजी करने पर कोई समझौता नहीं हुआ है। इसके अलावा, पीपी-15 के पास, चीनी ने भारतीय अधिकार क्षेत्र में तीन किलोमीटर अंदर तक सड़क बनाई है और हॉट स्प्रिंग क्षेत्र में 1,500 से अधिक चीनी सैनिकों ने गोगरा हाइट्स (पीपी-17ए) में दो से तीन किलोमीटर भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की है।


वयोवृद्ध इनफैंट्रीमैन और सेवानिवृत्त मेजर जनरल अशोक मेहता लिखते हैं, 'चीन ने अपने सैनिकों के जरिये लद्दाख में डेपसांग से गलवां तक और सिक्किम में नाकू ला से 1,500 किलोमीटर दूर कम से कम 60 किलोमीटर भारतीय रणनीतिक जमीन हथिया ली है, जहां चीनी सेना और भारतीय सेना निर्धारित सीमा के भीतर दो किलोमीटर क्षेत्र में गतिरोध बनाए हुए हैं। इलाके पर कब्जा बनाए रखने के लिए चीन बार-बार दो कदम आगे, एक कदम पीछे की रणनीति अपनाता रहता है।'


हाल के समय में वर्ष 2013 से चीन यही रणनीति अपनाता रहा है। 15 अप्रैल, 2013 को चीन के करीब चालीस सैनिकों ने दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) में करीब 20 किलोमीटर भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ कर ली थी। जब भारत-तिब्बत सीमा सुरक्षा बल ने उन्हें पीछे जाने के लिए कहा, तो उन्होंने इन्कार कर दिया। डीबीओ भारतीय सशस्त्र बलों का एक महत्वपूर्ण सैन्य अड्डा है और डेपसांग डीबीओ से लगभग 20 किलोमीटर दक्षिण में है।


अंत में तीन हफ्ते बाद दोनों पक्षों के स्थानीय कमांडरों के बीच कई बार फ्लैग मीटिंग के बाद दौलत बेग ओल्डी गतिरोध का समाधान किया गया। लेकिन हम अभी तक सुनिश्चित नहीं हैं कि क्या कब्जे वाले क्षेत्र को पूरी तरह से खाली करा लिया गया था या नहीं।


चीनी सैनिकों द्वारा डीबीओ से पीछे हटने के कुछ ही घंटों बाद वे लद्दाख में चुमार क्षेत्र में वापस लौट आए। चीनी सैनिकों ने पांच मई को अपने तंबू उखाड़े, फिर उसके बाद भारतीय बलों ने अपने टिन शेड हटाए। चुमार गतिरोध को 21 दिनों में हल कर लिया गया और चीन इस बात पर राजी हो गया कि भारतीय सेना पहले की तरह क्षेत्र में गश्त लगाती रहेगी।
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फिर सितंबर, 2014 में शी जिनपिंग की भारत यात्रा की पृष्ठभूमि में, डेमचोक गतिरोध 10 सितंबर, 2014 को शुरू हुआ, क्योंकि भारतीय गश्ती टीमों को पता चला कि चीनी सैनिकों ने भारतीय क्षेत्र के अंदर सड़क बनाने के लिए भारी मशीनरी तैनात की थी। डेमचोक भी उसी चुमार क्षेत्र में अवस्थित है। डेमचोक गतिरोध तब भी जारी रहा, जब मोदी और शी जिनपिंग 18 सितंबर को 12 सौदों पर हस्ताक्षर कर रहे थे। चीनी सेनाओं को दस सितंबर से पहले की स्थिति में वापस लौटने में एक हफ्ते का वक्त लगा।


ध्यान देने वाली बात है कि डीबीओ से लेकर डेमचोक तक, ये सभी बिंदु भारत की पूर्वी सीमा पर स्थित हैं, जो अक्साई चिन-लद्दाख तक फैले हुए हैं और भारतीय क्षेत्र, जैसे कि लेह, थोइस और सबसे महत्वपूर्ण सियाचिन ग्लेशियर तक पहुंच आसान बनाते हैं। स्पष्ट है कि चीन कई वर्षों से हमारे अधिकार क्षेत्र के सुविधाजनक स्थलों पर धीरे-धीरे कब्जा कर रहा है। अपनी राष्ट्रीय नीति के तहत चीन एक ही समय में बल और बातचीत, दोनों का प्रयोग करता है। हमें न केवल उनसे वही खेल खेलने के लिए तैयार रहना चाहिए, बल्कि उन्हें उसमें हरा देना चाहिए।


इस बीच, ऑस्ट्रेलिया को एक निमंत्रण देकर लगता है कहा गया है कि वह अगले चरण के मलाबार अभ्यास में शामिल हो। वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों के अनुसार, यह अभ्यास इस वर्ष के अंत में बंगाल की खाड़ी में भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका की नौसेनाओं को एक साथ लाएगा।


ऑस्ट्रेलिया के रक्षा मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने स्वीकार किया कि, 'ऑस्ट्रेलिया अपनी प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए आदान-प्रदान करने और स्वतंत्र, खुले और समृद्ध भारत-प्रशांत क्षेत्र में सामूहिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए चतुर्भुज रक्षा (क्वाड) गतिविधियों में भाग लेने का महत्व समझता है।' हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों में दक्षिण चीन सागर में इस समूह द्वारा अभ्यास करने से चीनी शासन को साफ संदेश देने की संभावना है।


ऐसा लगता है कि अमेरिकी सरकार के विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ द्वारा भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर को दिए गए कई आश्वासन पूरे हो रहे हैं। अमेरिकी नौसैनिक की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, अमेरिकी नौसेना के विमानवाहक, यूएसएस रोनाल्ड रीगन और यूएसएस थ्योडोर रूजवेल्ट, दोनों पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में गश्त लगा रहे हैं, जबकि यूएसएस निमित्ज मलक्का जलडमरूमध्य पार करके भारतीय नौसेना के साथ पासेक्स अभ्यास में भाग लेने के लिए बंगाल की खाड़ी में प्रवेश कर चुका है। प्रत्येक जहाज में साठ से अधिक विमान हैं और यह हाल के दिनों में प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी विमान वाहकों की सबसे बड़ी तैनाती है। एक विस्तारवादी शासन के खिलाफ उदारवादी लोकतांत्रिक देशों के हाथ मिलाने का यही वक्त है।

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