कुछ इसी प्रकार की भविष्यवाणी संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव बुतरस बुतरस घाली ने की थी कि पानी 21वीं सदी में संघर्ष का मुख्य केंद्र होगा-विशेषकर शुष्क और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में। यह भविष्यवाणी अब दक्षिण एशिया में मूर्त रूप लेती दिख रही है, जहां परमाणु हथियार संपन्न पड़ोसी भारत, पाकिस्तान और चीन नदी प्रणाली के असहज सह-अस्तित्व में बंधे हुए हैं। ब्रह्मपुत्र पर चीन की प्रतिकूल महत्वाकांक्षाओं से लेकर भारत द्वारा सिंधु जल संधि का पुनर्मूल्यांकन करने और पहलगाम हमले के बाद इसे निलंबित करने तक तथा पाकिस्तान के सूखे खेतों और फसलों को नुकसान के बढ़ते डर तक, जल-राजनीति राष्ट्रीय सुरक्षा गणना में प्रवेश कर चुकी है।
सिंधु जल संधि (1960) रद्द होने से पाकिस्तान में भारी जल संकट पैदा हो जाएगा। पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत तो सिंधु नदी के पानी पर निर्भर हैं। पाकिस्तान के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मंत्रालय के अनुसार, खरीफ सीजन (अप्रैल-जुलाई) में पाकिस्तान के वार्षिक फसल उत्पादन का लगभग 65 फीसदी हिस्सा होता है और खरीफ की लगभग 85 फीसदी बुवाई सिंधु-फेड नहरों से सिंचाई पर निर्भर है। पंजाब, जो पाकिस्तान के गेहूं उत्पादन में 70 प्रतिशत से अधिक और गन्ना उत्पादन में 50 प्रतिशत का योगदान देता है, में नहरी पानी की उपलब्धता कम होने के कारण धान और कपास की बुवाई में पहले ही तीन से चार सप्ताह की देरी हो चुकी है।
सिंधु नदी प्रणाली प्राधिकरण (आईआरएसए) के अनुसार, सिंध, जहां गन्ना, कपास और धान की खेती प्रमुखता से होती है, वहां सिंचाई जल की उपलब्धता में 30 प्रतिशत की गिरावट आई है। मई की शुरुआत में उपग्रह से प्राप्त चित्रों और एनडीवीआई (सामान्यीकृत अंतर वनस्पति सूचकांक) के रुझान दर्शाते हैं कि पिछले वर्ष की औसत की तुलना में फसल की सघनता में 14 फीसदी की कमी आई है। ओकारा, मुल्तान, बहावलपुर, जकोबाबाद और लरकाना के किसानों ने फसल की खराब स्थिति, मुरझाते पौधों और भूजल में कमी का हवाला देते हुए विरोध प्रदर्शन किया है, क्योंकि नदी के रिसाव से पुनर्भरण की कमी के कारण ट्यूबवेल सूख गए हैं।
भारत ने सिंधु जल संधि निलंबित कर फिलहाल तकनीकी रूप से नदी के प्रवाह को नहीं काटा है, ताकि वैश्विक प्रतिक्रिया न भड़के, लेकिन मानसून में नदी के प्रवाह और बाढ़ से संबंधित चेतावनियां साझा करना बंद कर दिया है, जिससे पाकिस्तान का राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) असहाय हो गया है, क्योंकि पाकिस्तान में बाढ़ संबंधी 90 फीसदी प्रारंभिक चेतावनियां भारत से प्राप्त होती हैं। भारत सरकार ने जल संग्रह बढ़ाने का खाका तैयार किया है, जिससे आगामी समय में निश्चित रूप से पाकिस्तान को पानी संबंधी परेशानियां होंगी। भारत की कार्रवाई के बाद पाकिस्तान संधि बहाली के लिए विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र में गुहार लगा रहा है, लेकिन भारतीय विदेश मंत्री ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस पर तब तक कोई बात नहीं होगी, जब तक कि पाकिस्तान की धरती से पैदा होने वाले आतंकवाद पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती।
विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई सिंधु जल संधि ने नदी प्रणाली का 80 फीसदी पानी पाकिस्तान को आवंटित किया था, जिसमें सिंधु, झेलम और चिनाब नदियां शामिल हैं, जबकि भारत ने रावी, ब्यास और सतलुज पर नियंत्रण बनाए रखा। उदारता की वजह से भारत ने अपना नुकसान भी सहा, लेकिन अब पानी सिर से काफी ऊपर जा चुका है। भारत ने सुनियोजित रूप से जल प्रवाह में व्यवधान पैदा कर पाकिस्तान की कृषि व्यवस्था की कमजोरी उजागर कर दी है। यह संकट न केवल पाकिस्तान की खाद्य और जल सुरक्षा की कमजोरी को सामने लाता है, बल्कि इस्लामाबाद द्वारा पोषित आतंकी ढांचे को नष्ट करने की तत्काल जरूरत पर भी बल देता है। अगर पाकिस्तान को अब पानी चाहिए, तो उसे न केवल अपनी कश्मीर की रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा, बल्कि उसकी धरती पर पनपने वाले आतंकी ढांचे को भी समूल नष्ट करना होगा, क्योंकि भारत का संदेश स्पष्ट है कि टेरर और ट्रीटी, अब साथ-साथ नहीं चल सकते।