13 जून, 2025 को, सावधानीपूर्वक योजनाबद्ध खुफिया समर्थित ऑपरेशन में, इस्राइल ने ईरान की परमाणु सुविधाओं और बैलिस्टिक मिसाइल स्थलों और इसके शीर्ष जनरलों और दो दर्जन से अधिक परमाणु वैज्ञानिकों के आवासों पर बमबारी की, जिससे वे सभी मारे गए। इस हमले के लिए इस्राइल ने बड़े पैमाने पर तैयारी की थी। इस्राइल ने 2015 में हुए ईरान-अमेरिका परमाणु समझौते का विरोध किया था। इस्राइल ने ईरानी परमाणु कार्यक्रम के जनक मोहसिन फखरीजादेह की 2020 में हत्या की थी। वह नब्बे के दशक से नियमित रूप से ईरानी परमाणु वैज्ञानिकों को खत्म करता रहा है।
अप्रैल 2024 में, इसने दमिश्क में ईरानी दूतावास पर बमबारी की, जिसमें इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड के आठ अधिकारी मारे गए थे। सितंबर 2024 में एक साथ कई पेजर और वाॅकी-टाॅकी विस्फोट में कई हिजबुल्ला लड़ाके मारे गए थे और सैकड़ों घायल हुए थे, जिसके पीछे इस्राइल का हाथ बताया जाता है। इस्राइल ने हमेशा कहा है कि ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम उसके ‘अस्तित्व के लिए खतरा’ हैं। ईरान की ही तरह हमास, हिजबुल्ला और हूती यहूदी राज्य के विनाश के लिए प्रतिबद्ध हैं। 2005 में ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने कहा था, ‘इस्राइल को नक्शे से मिटा दिया जाना चाहिए।’ 13 जून को घंटों चला इस्राइली हमला 1979 की क्रांति के बाद से इस्लामिक गणराज्य ईरान के लिए सबसे बड़ा सैन्य झटका है। 200 से अधिक इस्राइली विमानों ने 100 से अधिक स्थलों पर हमला किया, जिससे ईरान को व्यापक क्षति हुई। इन विमानों ने 4,000 किलोमीटर की यात्रा की। जाहिर है, इनमें अमेरिका एवं उसके सहयोगी देशों ने ईंधन भरा होगा। उन्होंने इराकी, सऊदी और जॉर्डन के हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल किया। उसके बाद से दोनों तरफ से हमला जारी है और इस जंग के जल्द खत्म होने के आसार नहीं दिखते।
अपने लोगों से लंबी अवधि के लिए भंडार जमा करने का आह्वान करते हुए इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि ये हमले ‘इस्राइल के अस्तित्व के लिए ईरानी खतरे को खत्म करने के लिए एक लक्षित सैन्य अभियान’ थे। एक इस्राइली सैन्य अधिकारी ने कहा कि इस्राइल ‘दर्जनों’ परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हमला कर रहा है, क्योंकि ईरान के पास कुछ ही दिनों में 15 परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त सामग्री है। जवाबी कार्रवाई में ईरान ने इस्राइल पर कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं और इस्राइल ने तेहरान में हवाई हमलों का दूसरा दौर शुरू कर दिया। नेतन्याहू ने कहा कि यह अभियान ‘ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों को नष्ट करने तक जारी रहेगा।’ नेतन्याहू लंबे समय से ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा के प्रति कूटनीति के बजाय सैन्य दृष्टिकोण अपनाने की वकालत करते रहे हैं।
हमले का मुख्य लक्ष्य नतांज में ईरान का मुख्य यूरेनियम संवर्धन स्थल था। इस्राइल की सेना ने कहा कि हमले के बाद ईरान ने इस्राइल की ओर लगभग 100 ड्रोन दागे और उसने उन्हें मार गिराया। हालांकि, वाशिंगटन का कहना है कि वह हमलों में शामिल नहीं था, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान पर इस्राइल का हमला ‘उत्कृष्ट’ रहा है और चेतावनी दी कि अभी बहुत कुछ होना बाकी है। उन्होंने दावा किया कि ईरान को समझौता करने के लिए ‘बार-बार मौका’ दिया, लेकिन ‘वह इसे पूरा नहीं कर सका।’ आगे उन्होंने कहा, ‘पहले ही बहुत मौतें और विनाश हो चुका है, लेकिन इस नरसंहार को समाप्त करने के लिए अब भी समय है, तथा आगे हमले और भी अधिक क्रूर होंगे। इससे पहले कि कुछ न बचे, ईरान को समझौता करना ही होगा।’
इस्राइली हमले से कुछ दिन पहले, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने ईरान के इस पाखंडी दावे को खारिज कर दिया था कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से शांतिपूर्ण था। उसकी रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि ईरान बम बनाने के लिए यूरेनियम संवर्धन की होड़ में लगा हुआ है। इसके महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने 13 जून, 2025 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को सूचित किया कि ईरान के नतांज परमाणु संयंत्र पर इस्राइल के हवाई हमले के परिणामस्वरूप ‘रेडियोधर्मी और रासायनिक संदूषण’ हुआ है।
इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ऑपरेशन राइजिंग लॉयन के बारे में बताने के लिए कई विश्व नेताओं, भारत, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका (चीन नहीं) से बात की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर लिखा, ‘मैंने भारत की चिंताओं को साझा किया और क्षेत्र में शांति और स्थिरता की जल्द बहाली की आवश्यकता पर जोर दिया।’ भारत के आधिकारिक प्रवक्ता ने कहा, ‘तनाव कम करने और अंतर्निहित मुद्दों को हल करने के लिए बातचीत और कूटनीति के मौजूदा चैनलों का उपयोग किया जाना चाहिए। भारत के दोनों देशों के साथ घनिष्ठ और मैत्रीपूर्ण संबंध हैं और वह हर संभव सहायता देने के लिए तैयार है।’
परिस्थितियां बता रही हैं कि इस संघर्ष से ईरान को भारी नुकसान होगा। क्षेत्र में ईरान के इस्लामी ‘भाई’ आधिकारिक तौर पर इस्राइल को कोसेंगे, लेकिन निजी तौर पर ‘इस्लामी क्रांति’ का निर्यात करने और क्षेत्र के राजतंत्रों को हटाने पर आमादा एक उपद्रवी को कमतर आंकने पर जश्न मनाएंगे। रूस भी ईरान को और कमजोर होते देख खुश है। चीन साहसिक बयान तो देगा, लेकिन करेगा कुछ नहीं। हालांकि, ईरान के नेताओं ने बड़े पैमाने पर जवाबी कार्रवाई का वादा किया है, और कहा है कि वे जवाब देंगे और इस्राइल द्वारा शुरू की गई पटकथा का अंत लिखेंगे। लेकिन वास्तविकता यह है कि ईरान अलग-थलग और अकेला पड़ गया है। वह लंबे समय तक क्षेत्र में अराजकता नहीं फैला पाएगा। इसकी वंचित आबादी निरंकुश शासन का पतन देखकर खुश होगी, जिसने देश की अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को कुचल दिया है।