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टाइम मशीन: इतना अभिशप्त रूबल,...तो क्या इतिहास दोहरा रहे हैं राष्ट्रपति पुतिन

अंशुमान तिवारी
Updated Sun, 17 Sep 2023 08:02 AM IST

सार

18वीं सदी के मध्य में रानी कैथरीन द्वितीय ने कागज के नोट की शुरुआत की। इस नोट में चांदी थी यानी सिल्वर स्टैंडर्ड। लोगों को कागज के नोट समझ में नहीं आए, लेकिन रूस कागजी करेंसी जारी करता रहा। इतने नोट छाप डाले गए कि चांदी का स्टैंडर्ड ही ध्वस्त हो गया। यानी जितनी चांदी रिजर्व में थी उससे ज्यादा नोट दौड़ गए।
 
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Russian President Vladimir Putin - फोटो : ANI


रूस का अधिकांश विदेशी मुद्रा भंडार जब्त हो चुका है। अब रूबल को सहारा देने के लिए कुछ नहीं है, बस करेंसी का छापाखाना बचा है। नोट छपेंगे, तो मुद्रास्फीति की महादशा शुरू हो जाएगी, जिसे हाइपर इन्फ्लेशन कहते हैं। रूस इसी आर्थिक तबाही की तरफ बढ़ रहा है।

बीते साल यानी 2022 की फरवरी में पहली बार रूस यूक्रेन युद्ध की लपटों ने रूबल को घेर लिया था। इसके बाद रूस की करेंसी का पतन शुरू हो गया।


मगर जरा ठहरिए, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इतिहास दोहरा रहे हैं। वह उन रूसी शासकों की जमात में शामिल हो गए हैं, जिन्होंने देश की करेंसी का तिया-पांचा कर दिया। रूस की महाशक्ति वाली छवि का यह सच सबसे दागदार है कि रूबल दुनिया की सबसे अभिशप्त और जोखिम भरी करेंसी मानी जाती है। रूबल के इतिहास को मुद्रा संकटों का इतिहास कहकर भी पढ़ाया जा सकता है।


आइए, हे टाइम मशीन, अपनी सीट पकड़िए। कुर्सी की पेटी बांधिए।

हमारा अगला पड़ाव होगा 16 वीं सदी का रूस, जहां आपको मिलेंगे नकली सिक्के, जिनकी वजह से रूबल का जन्म हुआ। बात 1530 के दशक की है। लिथुआनिया की राजकुमारी एलिना ग्लिंस्काया रूस पर राज कर रही थीं। आइवन द टेरिबल यानी रूस का पहला जार या सम्राट इसी रानी एलिना ग्लिंस्काया का बेटा था। तब टेरिबल शब्द का इस्तेमाल भय नहीं, ताकत के लिए किया जाता था।


रानी एलिना के दौर में रूस ने पहले मौद्रिक संकट का सामना किया। तब तक कोई आधिकारिक करेंसी नहीं थी, तो अचानक बाजार में नकली सिक्कों की भरमार हो गई। रानी ने चांदी का रूबल शुरू किया। यह आज के रूबल का सबसे पहला पूर्वज था। वह रूस की पहली हार्ड करेंसी थी। वर्ष 1662 में रूस में नया मुद्रा संकट आ गया। उस वक्त जार एलेक्सी मिखालोविच का शासन था। रूस और पोलैंड के बीच युद्ध चल रहा था। जार एलेक्सी को सेना के लिए संसाधनों की जरूरत थी, तो जार ने तांबे के सिक्के चला दिए, जो चांदी के रूबल से बदले जाते थे।


वह रूस की मुद्रा का पहला सबसे बड़ा अवमूल्यन था। चांदी के बदले तांबे के सिक्के देखकर लोग नाराज हो गए। रूस में दंगे भड़क उठे। उसे कॉपर रायट्स के नाम से जाना जाता है। जार ने बलवाइयों को रौंद डाला, मगर तांबे के सिक्के भी बंद हो गए। उसके बाद फिर रूबल को मुद्रा के तौर पर स्थिर होने में 40 साल लग गए।


टाइम मशीन में बैठकर 18 वीं सदी तक आते हुए आप यह पूछने पर मजबूर हो जाएंगे कि क्या रूस के शासक मौद्रिक संकट पैदा करने के शौकीन थे। 18 वीं सदी के मध्य में रानी कैथरीन द्वितीय ने कागज के नोट की शुरुआत की। यह नोट सिल्वर स्टैंडर्ड था। रूसी लोगों को कागज के नोट समझ में नहीं आए, लेकिन कागजी करेंसी जारी होती रही। इतने नोट छाप डाले गए कि चांदी का स्टैंडर्ड ही ध्वस्त हो गया। यानी जितनी चांदी रिजर्व में थी, उससे ज्यादा नोट दौड़ गए। यह भी रूबल का अवमूल्यन ही था। रानी कैथरीन एक बड़ा मौद्रिक संकट छोड़कर दुनिया से रुखसत हुईं।
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जार निकोलस द्वितीय के वित्त मंत्री थे सर्गेइ विटे। उन्होंने 1895 में रानी कैथरीन का फैसला बदला। कागज के नोट बंद हुए और फिर सोने का रूबल। इसके कुछ वर्षों बाद रूबल की कीमत में मजबूती आई। लेकिन रूस के शासक कहां मानने वाले थे? इसलिए रूबल की अच्छी किस्मत उम्रदराज साबित नहीं हुई।


पहले विश्वयुद्ध के दौरान रूस में आर्थिक संकट गहराने लगा था। वर्ष 1917 के रूस में क्रांति हुई, जार शासन का अंत हुआ, तो बोल्शेविक ने बूर्जुआ अर्थव्यवस्था को रीढ़ तोड़ने के लिए एक सनकी फैसला कर डाला। नई सरकार ने जान-बूझकर इतने कागजी रूबल छापे कि पांच साल में रूसी मुद्रा का 50 मिलियन (पांच करोड़) गुना अवमूल्यन हो गया।


चौंकिए मत...

पांच करोड़ गुना अवमूल्यन! यह रूस की कुख्यात हाइपर इन्फेलशन थी। कुछ ही वक्त में बोल्शेविक को समझ में आ गया कि कितनी बड़ी आफत बुला ली है। संकट इतना बढ़ा कि सरकार ने गोल्ड स्टैंडर्ड आधारित नई करेंसी जारी की। जोसेफ स्टालिन वैसे तो ताकतवर थे, मगर मौद्रिक प्रबंधन के स्कूल में शायद सही पढ़ाई नहीं की थी। उनका दौर रूबल के लिए विपित्त से भरा रहा। खूब नोट छापे गए। महंगाई बढ़ी। रूबल पिटता रहा। रूसियों की क्रय शक्ति टूटती रही। इस बुरे हाल के बीच दूसरे विश्वयुद्ध की तोपें गरज उठीं। हिटलर रूस पर चढ़ आया। संकट के दौर में स्टालिन ने कई तरह की मौद्रिक पाबंदियां आयद कर दीं। रूबल फिर टूटकर जमीन से जा लगा।  


वर्ष 1947 में जब भारत में आजादी का सूर्य उग रहा था, उस समय रूस में कम्युनिस्ट पार्टी का कुख्यात मौद्रिक सुधार एक बड़े संकट में बदल गया। इतिहासकार लिखते हैं, दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान रूस में खूब मुनाफाखोरी हुई थी।इससे नाराज सरकार ने बाजार से नकदी घटाने का फैसला किया, ताकि मुनाफाखोरों को नुकसान हो। मगर वह फैसला लागू होता, इससे पहले लोगों को इसकी भनक लग गई। रूसी लोग मुद्रा संकटों से इतने बेहाल हो चुके थे थे कि वे बैंकों की तरफ दौड़ पडे। रूबल निकाल कर सामान जुटाने की होड़ लग गई।

वह संकट रूबल की साख पर भारी पड़ा। स्टालिन के उत्तराधिकारी निकिता ख्रुश्चेव भी ढाक के तीन पात निकले। वर्ष 1961 में रूबल का एक और बड़ा अवमूल्यन हुआ।


सुधारवादी गोर्बाचोव भी रूस की मुद्रा का अभिशाप दूर नहीं कर सके। वर्ष 1991 में गोर्बाचोव के युग तक रूबल के कुछ और अवमूल्यन हुए। वर्ष 1990 में छोटे समय के लिए जरूरी सामान की कीमतें बुरी तरह बढ़ गईं। यदि आप टाइम मशीन से 1991 में आ गए हैं, तो आपकी मुलाकात रूसी बैंकों के सामने लाइन में लगे लोगों से होगी। गोर्बाचोव ने 50 और 100 रूबल के नोट बंद कर दिए गए। लोगों को नोट बदलने के लिए केवल तीन दिन का समय मिला।


कुछ याद आया ... !

2016 की भारतीय नोटबंदी!

गोर्बाचोव के तथाकथित सुधारों के बाद रूबल का एक और बड़ा अवमूल्यन हुआ।

बोरिस येल्तसिन मार्केट रिफॉर्म, भ्रष्टाचार और भयानक महंगाई लेकर आए। वर्ष 1998 में रूस गहरे आर्थिक संकट में धंस गया। कई बैंक डूबे और साथ में डूब गया बेचारा रूबल। बाद के वर्षों में रूस ने अपनी अर्थव्यवस्था को कच्चे तेल पर केंद्रित कर लिया। जब-जब तेल की कीमत गिरी, रूबल पसीना छोड़ गया। वर्ष 2008 में ग्लोबल बैंकिंग संकट में रूबल को गहरे घाव लगे थे।


वर्ष 2014 में पुतिन ने क्रीमिया पर हमला बोला। रूस पर प्रतिबंध लगे और यहीं से रूबल का निर्णायक पतन शुरू हुआ। मुद्रा बाजार के लोग कहते हैं कि पुतिन का रूबल अब रबल यानी कंकड़-पत्थर में बदल चुका है यानी करेंसी की भारतीय भाषा में एक आना या पैसे के बराबर।


रूबल का यह पतन दर्दनाक है। रूस का इतिहास हमें सिखाता है कि शासकों को हथियार बनाना भले ही आता हो, हुई होंगी क्रांतियां, पर महंगाई और कमजोर मुद्रा ने उस देश की कई पीढ़ियों का भविष्य खत्म कर दिया। रहा होगा रूस महाशक्ति, लेकिन उसका आर्थिक प्रबंधन दुनिया के लिए सबसे भयानक और जिंदा नसीहत है।

 

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