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धूप आने दो: भीमसेन और 1000 हाथियों का बल, प्रमाण से परे है संख्या का सवाल

आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 17 Sep 2023 07:53 AM IST

सार

भीमसेन ने जब आंखें खोलीं तो स्वयं को नागलोक में पाया। वहां भीमसेन की भेंट नागराज आर्यक से हुई। आर्यक दरअसल, रिश्ते में भीम के नाना का नाना था।
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महाभारत - फोटो : सोशल मीडिया


घटना उस समय की है, जब कौरवों और पांडवों की शिक्षा आरंभ हुई थी। ज्येष्ठ कौरव दुर्योधन के मन में पांडवों के प्रति द्वेष और कुंठा का भाव बचपन ही से बहुत प्रबल था। इसका प्रमुख कारण यह था कि कौरवों के पिता धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन थे, जिसके कारण हस्तिनापुर का राजसिंहासन धृतराष्ट्र के स्थान पर उनके अनुज पांडु को मिल गया।


पांडु-पुत्र युधिष्ठिर का जन्म दुर्योधन से पहले हुआ, इसलिए सभी कौरवों-पांडवों में युधिष्ठिर सबसे बड़ा था। यही कारण था कि दुर्योधन के मन में डर बैठ गया कि पिता धृतराष्ट्र की तरह उसके हाथ से भी कहीं राज्य की बागडोर निकल न जाए।  उसे पांडवों से ईर्ष्या थी और उसने पांडवों को अपने मार्ग से हटाने के अनेक प्रयास भी किए। ऐसा ही एक कुत्सित प्रयास दुर्योधन ने भीम को मारने के लिए बचपन में किया था।


भीमसेन को भोजन में खीर बहुत पसंद थी। उसकी इस कमजोरी का लाभ उठाकर एक दिन दुर्योधन और दु:शासन ने खीर में विष मिलाकर भीमसेन को खिला दिया। खीर खाकर जैसे ही भीम मूर्च्छित हुआ, दुर्योधन और उसके भाइयों ने मिलकर भीम को नदी में फेंक दिया, जहां भीम को नदी के सांपों ने डंस लिया। किंतु विषैली खीर खाने और नागों के डंसने के बाद भी भीमसेन की मृत्यु नहीं हुई! यह बहुत आश्चर्यजनक बात थी लेकिन ऐसा हुआ कैसे?


दरअसल, विष दो प्रकार के होते हैं-जंगम और स्थावर। जंगम विष पशु-पक्षियों के शरीर, उनके नाखूनों और दांतों में पाया जाता है, जबकि स्थावर विष, पेड़-पौधों एवं वनस्पति आदि से मिलता है। महाभारत-कथा के अनुसार भीम को खीर में स्थावर विष दिया गया था, जिसने बाद में सांपों के जंगम विष को काट दिया और उसके प्रभाव को समाप्त कर दिया। इस तरह ढेर सारा विष शरीर में जाने के बावजूद भीमसेन जीवित बच गया।


पानी के नीचे पहुंचकर भीमसेन ने जब आंखें खोलीं, तो उसने स्वयं को नागलोक में पाया। वहां भीमसेन की भेंट नागराज आर्यक से हुई। आर्यक दरअसल, रिश्ते में भीम के नाना का भी नाना था। इस नाते भीमसेन के तार नागवंश से भी जुड़ते हैं। उसी अवसर पर आर्यक ने भीमसेन को बताया कि नागलोक में दिव्य रस से भरे अनेक कुंड हैं और एक कुंड का रस पीने से शरीर में एक हजार हाथियों का बल आ जाता है।


महाभारत के आदिपर्व के 127वें अध्याय का 71वां श्लोक कहता है कि भीमसेन ने नागलोक के आठ कुंडों का रस पी लिया। इसका आशय हुआ कि यदि एक कुंड का रस पीने से शरीर में एक हजार हाथियों का बल आ जाता था, तो आठ कुंडों का रस पी लेने के बाद भीमसेन के शरीर में आठ हजार हाथियों का बल तो अवश्य ही रहा होगा। इस तथ्य से हमें आरंभ में उठाए गए दोनों प्रश्नों के उत्तर मिल गए हैं।
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महाभारत काल में ‘हजार’ की संख्या, क्या आज प्रयोग होने वाली ‘हज़ार’ की संख्या के बराबर ही है या इन दोनों में कुछ अंतर है? इसका उत्तर भी हमें महाभारत के ही एक अन्य अध्याय में मिलता है। आदिपर्व के 216वें अध्याय में एक लघुकथा आई है। इस कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण किसी कारणवश पांच अप्सराओं से कुपित हो गए और उन्होंने पांचों को शाप दे दिया कि उन अप्सराओं को शत (सौ) वर्ष तक मगरमच्छ बनकर रहना पड़ेगा। शाप से घबराकर अप्सराओं ने ब्राह्मण से क्षमा मांगी। तब ब्राह्मण ने बताया कि प्राय: शत (सौ) और सहस्र (हजार) शब्दों को ‘अनंत संख्यावाचक’ माना जाता है परंतु दिए गए शाप में प्रयुक्त ‘शत’ शब्द, अनंत वाचक नहीं अपितु एक सौ वर्ष का ‘परिमाण वाचक’ ही है।


उपरोक्त प्रसंग से यह स्पष्ट है कि प्राचीन काल में प्रयोग किए जाने वाले सौ एवं हजार जैसे शब्दों का अर्थ, सामान्यत:  'अनंत' अथवा 'बहुत अधिक' समझा जाता था। इसलिए जब कभी भीमसेन के संदर्भ में यह कहा जाता है कि उनके शरीर में दस हजार हाथियों का बल था, तो इसका आशय इतना ही समझना चाहिए कि भीमसेन के शरीर में अपरिमित यानी, बहुत अधिक बल था।

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