नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद) का रुझान संसार की ओर नहीं था। वह अध्यात्म और ब्रह्म की खोज में लगातार तत्पर रहा करते थे। एक बार उन्होंने तय किया कि वह संसार का त्याग कर देंगे। अर्थात घर-परिवार सब छोड़कर कहीं दूर ब्रह्म की खोज में निकल जाएंगे।
उन्होंने मन ही मन जाने का दिन भी निश्चित कर लिया। जिस दिन उन्हें निकलना था, उसी दिन अचानक श्रीरामकृष्ण परमहंस कलकत्ता (कोलकाता) आ गए। उन्हें देखकर नरेंद्र के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। श्रीरामकृष्ण ने उनसे कहा, नरेंद्र आज ही वापस दक्षिणेश्वर लौट जाऊंगा। और मेरा मन है कि तुम भी मेरे साथ चलो।
नरेंद्र ने बहाना बनाने और वहां से निकलने की भरपूर चेष्टा की। लेकिन अपने किसी उपाय में वह सफल न हो सके। आखिरकार उन्हें गुरु की बात माननी ही पड़ी। रात को श्रीरामकृष्ण ने भावुक होकर भजन गाया। नरेंद्र भी उस भजन को सुनकर भावुक हो गए और रो पड़े। उस भजन के शब्दों से साफ-साफ पता लग रहा था कि गुरु अपने शिष्य के मन की बात ताड़ चुके हैं, इसलिए उन्हें अपने साथ लेकर आए हैं।
श्रीरामकृष्ण ने नरेंद्र को बगल में बिठाते हुए बड़े प्रेम से कहा, मैं जानता हूं कि तुम्हें इस संसार के बंधन जरा भी प्रिय नहीं हैं। और तुम यहां रहने के इच्छुक नहीं हो। लेकिन जब तक मैं इस संसार में हूं, मेरी आज्ञा है कि तुम भी यहीं रहो। तुम्हें इसी संसार में रहकर धर्म और मानवता के लिए काम करने हैं।
बाद में किसी अवसर पर विवेकानंद ने इस प्रसंग का जिक्र किया और कहा कि श्रीरामकृष्ण परमंहस ही ऐसे व्यक्ति थे, जिनका मुझ पर अटूट विश्वास था। उनके अटल विश्वास ने ही मुझे उनसे मिलवाया और उनसे जोड़कर रखा।