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गांधी जैसा गांव चाहते थे

आर विक्रम सिंह
Updated Sun, 22 Oct 2017 09:41 PM IST
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विवादों का समाधान
बेहतर हो कि हमारी ग्राम्य समस्याओं के समाधान के प्रयास वहीं से प्रारंभ किए जाएं, जहां समस्याएं पैदा होती हैं। अगर हमारे ग्राम इसमें सक्षम हो सकें, तो निर्विवाद रूप से ग्रामों का गांधीवादी स्वप्न साकार हो सकता है। कई प्रयोगों के बाद भी हम पिछले 70 वर्षों में विवादों के पंचायती समाधान की व्यवस्था स्थापित करने में सफल नहीं हो सके हैं। समस्याएं बढ़ी हैं, लेकिन समाधान के रास्ते लंबे हैं। विवाद हमें वर्षों तक यथास्थिति में बनाए रखता है। विकास का रास्ता अवरूद्ध होता है। ग्रामों को विवादरहित बनाना प्रत्येक ग्रामसभा का लक्ष्य होना चाहिए। हमारी ग्रामसभाओं ने अपने लिए यह लक्ष्य निर्धारित नहीं किया। बल्कि गांवों में भूमि विवाद और मुकदमे बेतरह बढ़ते गए हैं। अब समाधान के फोरम कौन से हैं? पहला राजस्व प्रशासन है, लेखपाल से लेकर जिलाधिकारी तक, दूसरा राजस्व न्यायिक व्यवस्था। तीसरी है, हमारी सिविल न्यायालय व्यवस्था। अगर आबादी की भूमि पर किसी ने कब्जा कर लिया है, तो सिवा गवाहियों के हमारे पास कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं होता कि कब्जा कब से है। फिर सिविल न्यायालयों में मुकदमा लंबा चलता है। अवैध कब्जेदारों के विरूद्ध ग्रामसभा अक्सर कमजोर पक्षकार सिद्ध होती है।


राजस्व संहिता में ग्राम समाज की भूमियों पर अवैध कब्जे के खिलाफ बेदखली, जुर्माने की व्यवस्था है। जुर्माना जमा नहीं होता। जमा होता भी है, तो अवैध कब्जा फिर भी खाली नहीं होता। हमारे गांवों में वह नैतिक बल नहीं बचा कि गलत को गलत कहा जा सके। दबंग को कोई कुछ बोलता नहीं। बात फिर स्थानीय प्रशासन पर आ जाती है। स्थानीय प्रशासन यानी तहसीलदार, उप जिलाधिकारी। प्रत्येक स्तर पर राजनीतिक दखल उन्हें कमजोर करता है। वे आकाओं को साधने में लगे रहते हैं। ग्रामीण समस्याओं के समाधान की प्राथमिकता आखिर किसकी है?


बहुत वर्ष पहले मैं बांसगांव, गोरखपुर में एसडीएम था। तब वहां अपराध संस्कृति का बोलबाला था। स्थानीय प्रतिनिधियों में अपराधियों, हिस्ट्रीशीटरों की बहुतायत थी। हत्याओं के बाद अक्सर तब तक तेहरवीं न करने की परंपरा थी, जब तक कि हत्या का बदला न ले लिया जाए। तहसील में दिन-दहाड़े एक अमीन की हत्या कर दी गई थी। प्रशासन हाशिये पर था। ऐसे माहौल में हमने गांव-गांव बैठकें कर विवादों के समाधान का अभियान चलाया। ये भूमि विवाद थे, जो वर्चस्व की जंग, फिर हत्याओं में तब्दील हो जाते थे। उस अभियान में करीब 30-35 विवाद सुलझाए गए। जो लोग वर्षों से कभी आमने-सामने नहीं बैठे थे, वे सामने लाए गए। माहौल बदलना प्रारंभ हुआ। विवादों के पक्षकारों को आमने-सामने बैठाने जैसा काम ग्रामसभा में ही हो सकता है, इसलिए ग्रामसभा भूमि विवादों के समाधान की सबसे प्रभावी संस्था हो सकती है।


वर्ष 1973 के सीआरपीसी संशोधन ने (जो न्यायिक और प्रशासनिक शक्तियों के अलगाव पर लक्षित था) प्रशासनिक प्रभावशीलता को कमजोर किया है। इसका एक दुष्प्रभाव यह भी हुआ कि राजनीति के रास्ते अपराधियों के लिए खुल गए। जो ग्रामीण दबंग है, उसका ग्रामसमाज, आबादी, तालाबों पर कब्जा कर लेना आम-सी बात है। ऐसे लोगों का जुड़ाव राजनीति से होता रहा है। इसलिए ग्रामसमाज की जमीनों को खाली कराने के कानून बहुत सख्त नहीं बन सके। अंग्रेज़ों के जमाने से बैंक ऋण आदि की वसूली की व्यवस्था यह थी कि किसी भी बकायेदार को तहसीलदार द्वारा पकड़कर तहसील लॉकअप में बंद किया जा सकता है, लेकिन ग्रामसमाज की भूमियों को खाली कराने के लिए इस प्रकार की व्यवस्थाएं आज तक नहीं बनाई जा सकीं। अगर कानून में संशोधन कर ग्राम समाज की भूमि के अवैध कब्जेदारों को तहसील लॉकअप में बंद करने की व्यवस्था लागू की जाए, तो गांव का दबंग तो अपने-आप औकात में आ जाएगा।


ग्राम प्रधान की शक्तियां बढ़ी हंै, वित्तीय अधिकार बढ़े हैं, लेकिन इसका एक परिणाम गांवों में बढ़ती हुई पार्टीबंदी के रूप में भी सामने आया है। प्रधानों के अधिकारों का उसके समर्थक वर्ग ने अपहरण कर लिया है। वह पूरे गांव का प्रधान नहीं बन पाता। ऐसे प्रधान कम होते गए है, जिन पर पूरा गांव भरोसा करता हो। ऐसी स्थिति में विवादों के समाधान की ग्रामस्तरीय व्यवस्था को लागू करने में बड़ी दुश्वारियां हैं। लेकिन ऐसी व्यवस्था का होना जरूरी है। यह कहने से काम नहीं चलेगा कि ग्राम स्तर पर कुछ हो ही नहीं सकता। ग्रामसभा सिर्फ ग्राम विकास की एजेंसी नहीं है। ग्रामसभा का नैतिक व न्यायिक पक्ष भी सामने आना जरूरी है। विवादों का समाधान हमारी गांधीवादी पंचायती व्यवस्था की आत्मा है। विवादों के पक्षकारों को पंचायत समाधान में आमने-सामने बैठाना जरूरी है। शासन के आदेशों से थाना एवं तहसील स्तरीय समाधान दिवसों का संचालन हो रहा है, जिसमें समस्त विभागीय, प्रशासनिक व पुलिस अधिकारीगण जन समस्याओं का निस्तारण करते हैं। लेकिन हमारी समस्याएं गांव से ही पैदा होती हैं और समाधान के अभाव में बड़ी होती चलती हैं। ग्राम समाधान दिवस भी उतना ही जरूरी है, जितना तहसील एवं जनपद स्तरीय समाधान। यह ठीक है कि हमारा प्रधान अक्सर निष्पक्ष नहीं होता। यह भी स्वीकार है कि कभी प्रभावी रही ग्राम पंचायत न्याय-व्यवस्था प्राणहीन हो चुकी है। इसका मतलब यह तो नहीं कि जनपंचायतों के प्रारंभ की कहीं कोई संभावना ही नहीं है।


जन समस्याओं के प्रति सरकार बहुत सजग है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री स्वयं समीक्षाएं कर रहे हैं। सरकार जो न्याय, समाधान व विकास की प्रतीक है, उसकी मौजूदगी का एहसास गांव की देहरी और द्वार पर हो सके, इसकी जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की है। ग्राम समाधान दिवस जिसकी शुरूआत बरेली जनपद से हो रही है, इस दिशा में एक सार्थक पहल बन सकता है। आशा है कि यह प्रयास हमारे ग्रामों को निर्विवाद बनाने की दिशा में बहुत दूर तक जाएगा।


-लेखक प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं। 
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