जुमला परेड
गुरुत्वाकर्षण केंद्र के सरकने के कारण आने वाले दिनों में हम और भी घोषणाओं व घटनाओं की उम्मीद कर सकते हैं। एक घटना 20-21 सितंबर को घटी : महिला आरक्षण जुमला विधेयक संसद से पारित हुआ। वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव के बाद यह विधेयक लागू होगा। इसके अलावा जिन जुमलों को अमलीजामा पहनाने की तैयारी है, वे हैं-एक देश- एक चुनाव और समान नागरिक संहिता। एक देश-एक चुनाव को लागू करने के लिए कोविंद समिति बनाम विधि आयोग के बीच और समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार करने के लिए उत्तराखंड बनाम असम बनाम मध्य प्रदेश के बीच कड़ी प्रतिद्वंद्विता है।
इस बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक (नेता) मोहन भागवत ने ‘धर्मांतरण’ और ‘लव जिहाद’ की बढ़ती घटनाओं पर गहरी चिंता जताई है तथा संघ के सदस्यों से ‘आक्रामक’ ढंग से इसका मुकाबला करने के लिए कहा है। ऐसे में, गिरजाघरों, पादरियों, मिशनरियों और ईसाइयों की प्रार्थना बैठकों पर हमलों के लिए तैयार रहना होगा। ऐसे ही, अंतरधार्मिक विवाह करने वाले जोड़े हिंदू लड़कियों की मर्यादा की रक्षा करने वाले नैतिक-धार्मिक ब्रिगेड के हमले से खुद को बचाएं। (मुझे हैरानी इस पर है कि उन हिंदू लड़कों की मर्यादा कौन बचाएगा, जो गैर हिंदू लड़कियों के साथ रहते हैं?)
प्रमाण दें
धर्मांतरण और लव जिहाद के निराधार आरोपों से मैं स्तब्ध हूं। कृपया उन हजारों बच्चों से बात करें, जो ईसाइयों द्वारा संचालित स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ते हैं (क्योंकि वे शिक्षा संस्थान सर्वश्रेष्ठ हैं)। उनमें से कितने छात्रों को ईसाई बनाने की कोशिश हुई है? कृपया अपने आप से पूछें कि पिछले साल आपके गांव या शहर में कितने अंतरधार्मिक विवाह हुए हैं? श्री नारायणमूर्ति का एक कथन बेहद प्रसिद्ध है : ‘मैं सिर्फ ईश्वर में विश्वास करता हूं। बाकी चीजों के लिए मुझे आंकड़ा दीजिए।’
संघ प्रमुख क्या धर्मांतरण और लव जिहाद के आंकड़े देंगे? सम्माननीय प्रधानमंत्री ने भी मोर्चा थाम लिया है। उन्होंने कहा है कि सनातन धर्म निशाने पर है। श्री भागवत ने धर्मांतरण और लव जिहाद जैसे मुद्दे संघ के तरकश से निकाले हैं। महिला आरक्षण विधेयक को प्रधानमंत्री की तरफ से ‘उपहार’ के रूप में पेश किया जाएगा (जबकि असल में यह एक विफल बैंक का पोस्ट-डेटेट चेक है)। जी-20 से संबंधित तस्वीरें और वीडियो उदारता से और अनिवार्य रूप से दृश्य मीडिया और सोशल मीडिया पर इस दावे के सबूत के तौर पर लगातार दिखाए जाएंगे कि भारत विश्वगुरु है।
एकता और एजेंडा
दूसरी तरफ ‘इंडिया’ की साझेदार पार्टियां उन मुद्दों को उठाने की तैयारी में लगी हैं, जिन्हें वे प्रासंगिक मानती हैं और यह भी मानती हैं कि इनसे लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है। ये मुद्दे हैं- मुद्रास्फीति, बेरोजगारी, नस्लीय और सांप्रदायिक विवाद, भड़काऊ भाषण (हेट स्पीच) या भीड़ को भड़काकर किया जाने वाला अपराध (हेट क्राइम), उदारता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समेत तमाम आजादी पर प्रतिबंध, राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण, संघवाद का क्षय, संविधान पर हमला, न्यायपालिका को कमतर करने की कोशिश, सीमा पर चीनी आक्रामकता, आतंकवादी घटनाएं, आर्थिक वृद्धि की धीमी रफ्तार, असमानता की खाई चौड़ी होना, राजनीतिक वर्ग और व्यापारी वर्ग के बीच साठगांठ वाली पूंजीवादी व्यवस्था (क्रोनी कैपिटलिज्म), कल्याणकारी योजनाओं में कमी, राष्ट्रीय कर्ज में वृद्धि, खुफिया और जांच एजेंसियों का दुरुपयोग, संसदीय संस्थाओं और परंपराओं को महत्वहीन करना, तथा केंद्रवाद व व्यक्ति पूजा की प्रवृत्ति का विस्तार। भाजपा धनबल, बाहुबल तथा कानून के दुरुपयोग के जरिये विपक्ष के हमले को बेअसर करने की उम्मीद कर रही है।
आइए, हम इन आरोपों पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि अर्थव्यवस्था मुश्किल में और कुप्रबंधित है।
बेरोजगारी: अगस्त, 2023 में बेरोजगारी दर 8.1 फीसदी थी। वर्ष 2022 में युवा बेरोजगारी (15-24 वर्ष) 23.22 प्रतिशत थी। स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2023 रिपोर्ट के मुताबिक यह 42 फीसदी है। अगस्त, 2023 में 1,91, 60,000 परिवारों ने मनरेगा के तहत काम की मांग की।
कीमत और मुद्रास्फीति: रिजर्व बैंक के अगस्त, 2023 के बुलेटिन के मुताबिक, खुदरा मुद्रास्फीति 6.8 फीसदी, ईंधन और प्रकाश मुद्रास्फीति 4.3 प्रतिशत तथा खाद्य मुद्रास्फीति 9.2 फीसदी थी। उपभोक्ता मुद्रास्फीति फरवरी, 2022 से रिजर्व बैंक की लक्षित छह फीसदी की सीमा से ऊपर बनी हुई है।
पारिवारिक वित्त: जीडीपी के प्रतिशत के हिसाब से देखें, तो परिवारों की वित्तीय संपत्ति वर्ष 2020-21 के 15.4 फीसदी से घटकर 2022-23 में 10.9 प्रतिशत रह गई। जबकि इसी अवधि में परिवारों की वित्तीय जिम्मेदारी (देनदारी) 3.9 फीसदी से बढ़कर 5.8 प्रतिशत हो गई। कुल वित्तीय संपत्ति 11.5 प्रतिशत से घटकर 5.1 फीसदी रह गई।
जनता केंद्रित तीन जांच परीक्षा में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार दयनीय रूप से विफल साबित हुई है। वर्ष 1977 के बाद से पक्ष-विपक्ष के बीच ऐसी जोरदार मोर्चाबंदी कभी नहीं हुई।