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बेहतरी के बारह सुझाव

Tue, 26 May 2015 07:57 PM IST
शंकर अय्यर
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मोदी सरकार के सामने एक बड़ी आर्थिक चुनौती है। दरअसल, पूरे शासन तंत्र और उसकी प्रक्रियाओं में किसी भी तरह की अक्षमता को अर्थव्यवस्था बमुश्किल ही झेल सकती है। यह आर्थिक चुनौती एक तरह से राजनीतिक बाध्यता भी है। गौरतलब है कि हर महीने दस लाख लोग यानी हर वर्ष एक करोड़ बीस लाख लोग देश के श्रमबल का हिस्सा बन रहे हैं। इस मामले में अगर जरा भी देर की गई, तो यह युवा वर्ग की महत्वाकांक्षाओं पर रोक लगाने जैसी बात होगी, जिसमें एक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन के भड़कने का जोखिम भी हो सकता है। चिंता की वजह यह संदेह है कि मोदी सरकार शायद ही इस चुनौती को पहचान पा रही है। सरकार का पहला वर्ष उसके इरादों को बयां करता है। मगर अब समय है, इरादों को जमीनी स्तर पर पूरा करने का। मोदी सरकार के लिए मेरे बारह सुझाव हैं, जिन पर आगे बढ़ा जा सकता है-
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कर्ज में कमी लाने के लिए ब्लूप्रिंट-  राजकोषीय घाटे को काबू में रखना ही काफी नहीं है। सरकार के लिए जरूरी है कि वह अपने कर्ज बोझ को हल्का करने के लिए तीन वर्ष का एक रोडमैप तैयार करे। अब तक स्थिति यह है कि सरकार जो एक रुपया उधार लेती है, उसका तीन-चौथाई हिस्सा पिछला कर्ज चुकाने पर ही खर्च हो जाता है। इससे न सिर्फ निवेश पर असर पड़ता है, बल्कि यह भारत को एक महंगी अर्थव्यवस्था भी बनाता है।

जमीन को वैधता देना- रेलवे, रक्षा और सार्वजनिक उपक्रमों जैसे उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सरकार के पास लाखों हेक्टेयर अतिरिक्त जमीन होती है। हालांकि कोई भी विभाग इसे स्वीकार नहीं करेगा, मगर सच यह है कि ऐसी जमीन को पहचान देने के लिए कोई सटीक नियम-कानून नहीं है। ऐसी जमीन का मूल्यांकन होना चाहिए, और इसे एक निवेश ट्रस्ट के सुपुर्द किया जाना चाहिए।
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फसल मानचित्र- सैटेलाइट मैपिंग, मृदा परीक्षण और खरीद प्रक्रिया में सुधार के जरिये सरकार फसल मानचित्र को फिर से तैयार कर सकती है। वह ड्रिप सिचाई पद्धति और फूल, फल व सब्जियों के लिए कृषिगत सेज के निर्माण के लिए फंडिंग की व्यवस्था भी कर सकती है।

मंजूरी प्रक्रिया का विकेंद्रीकरण- निवेश में देरी की प्रमुख वजह मंजूरी लेने के कई स्तरों का होना है। ऊर्जा, होटल इत्यादि से जुड़ी परियोजनाओं को जिला, राज्य और फिर केंद्र स्तर पर मंजूरी लेनी पड़ती है। केंद्र को इस ओर ध्यान देना चाहिए। किसी शहर में संयंत्र लगाने की मंजूरी के लिए दिल्ली का चक्कर लगाने की कोई वजह नहीं है।

जल का पुनर्चक्रण- भारत स्मार्ट सिटी की तरफ बढ़ रहा है। जल संसाधनों के पुनर्चक्रण के लिए सिंगापुर मॉडल से सीख लेनी चाहिए।

दूरवर्ती कार्बन फुटप्रिंट- खाद के उत्पादन के लिए भारत ईंधन व अन्य आगतों को आयात करता है। इस मामले में मोरक्को, गैबन या ईरान व कतर जैसे देशों के सहयोग से ऊर्जा के स्रोत से दूर एक एसईजेड यानी सेज की स्थापना करने से लागत कम होगी, खाद की गुणवत्ता सुधरेगी और तट पर ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव में कमी आ सकेगी।

ईएमआई के लिए नई दर- उधार देने का पुराना नियम है कि ब्याज दर का संबंध जोखिम को देखते हुए उधार लेने वाले की छवि और जिस उद्देश्य के लिए उधार लिया जा रहा है, उससे होता है। घर, वाहन इत्यादि के लिए उधार लेने वालों के लिए नई व्यवस्था की जरूरत है, जो गैर निष्पादनीय संपतियों और व्यक्ति की क्रेडिट रेटिंग पर आधारित हो।

खाद्य प्रसंस्करण में पहल- खराब हो सकने वाले उत्पादों के संदर्भ में खेतों और घरों को जोड़ने के लिए भारत में एक राष्ट्रीय बाजार की बहुत जरूरत है। क्यों न ई-कॉमर्स उपक्रमों की भांति उत्पादकों और उपभोक्ताओं को ऑनलाइन जोड़कर एक सहभागी बाजार बनाने के लिए पिछले बजट में घोषित दस हजार करोड़ रुपये का उपयोग किया जाए?

नवीकरणीय ऊर्जा के लिए माइक्रो बाजार- नवीकरणीय ऊर्जा के मामले में अब तक सरकार का ध्यान बड़ी परियोजनाओं, ग्रिड, पारेषण इत्यादि पर ही रहा है। जरा सोचिए, अगर ग्राम पंचायतें, हाउसिंग सोसाइटी, क्रिकेट स्टेडियम और स्कूल वगैरह अपनी छतों को माइक्रो-मिनी सोलर सेट की स्थापना के लिए किराए पर दें, तो नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में एक बड़े निजी बाजार की संभावनाएं खुल जाएंगी।

एक योजना मेक इन इंडिया के लिए- अभी तक मेक इन इंडिया का विचार बड़े बिजनेस और सम्मोहक उत्पादों तक ही सीमित है। कई ऐसे उत्पाद हैं, मसलन हृदय संबंधी उपचार में उपयोग होने वाली स्टैंट (ट्यूब) या फ्लोरीकल्चर और महंगी नकद फसलों में काम आने वाले ग्रीनहाउस, जिन्हें भारत को आयात करना पड़ता है। क्यों न ऐसे संभावित उत्पादों की एक सूची तैयार की जाए और भारतीय व विदेशी उद्यमियों को विक्रय केंद्र स्थापित करने के लिए आमंत्रित किया जाए?

सरकारी अस्पतालों के लिए पीपीपी मॉडल- हर राज्य में एम्स जैसे अस्पताल हों, सरकार इस ओर ध्यान दे रही है, जो स्वागतयोग्य है। मगर भारत को सख्त जरूरत ऐसे सरकारी अस्पतालों की है, जो मध्यवर्ग को पर्याप्त सुविधाएं दे सके, इसके लिए उन्हें पैसा खर्च करना पड़े, तो कोई हर्ज नहीं। एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) वाला मॉडल अपनाया जा सकता है, जिसमें सरकार जमीन देगी, बीमा कंपनियों का अपना हिस्सा होगा, और निजी डॉक्टर अपनी सेवाएं देंगे।

ई-लर्निंग- देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है। एक सुझाव यह है कि महत्वपूर्ण विषयों के सबसे अच्छे अध्यापकों के लिए एक राज्य स्तरीय पुरस्कार की व्यवस्था हो। ऐसे अध्यापकों की कक्षाओं की रिकॉर्डिंग की जाए, और इसे राज्य के सभी स्कूलों को मुहैया करा दी जाए। तो अगली बार जब मास्टर जी स्कूल न आएं, जैसा अक्सर सरकारी स्कूलों में होता ही है, बच्चों के पास विकल्प होगा, राज्य के बेहतरीन अध्यापक से पढ़ने का।
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-अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक
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