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अच्छे दिन आएंगे, सब्र कीजिए

Mon, 25 May 2015 07:21 PM IST
मनु पंवार
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पता नहीं, हमारी पब्लिक अच्छे दिनों के लिए इतनी अधीर क्यों हुई जा रही है! साल भर से वह गाए जा रही है कि अच्छे दिन कब आएंगे। पब्लिक को बॉलीवुड की फिल्मों से सबक लेना चाहिए। एक सुपर हिट फिल्म में एक दुखियारी मां राखी लगभग पूरे वक्त यही रट लगाती रह गई कि मेरे करण-अर्जुन आएंगे। लेकिन वे दोनों आए फिल्म के आखिर में। आए क्या जी, छा गए। पब्लिक की जबर्दस्त तालियां भी बटोर ले गए। उनके आते ही दुखियारी मां के सारे दुख-दर्द झटके में काफूर हो गए। भई, फिल्म तो डाइरेक्टर की होती है। सोचिए, अगर वह 'करण-अर्जुन' को पहले ही ले आता, तो फिल्म क्लाइमेक्स तक पहुंचती कैसे? इसलिए हे सज्जनो, अच्छे दिन भी सरकार के पहले ही बरस में थोड़े ही आ जाएंगे।
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सब्र रखिए, फिल्म की अवधि की तरह सरकार का भी पांच साल का वक्त फिक्स है। पूरी फिल्म में ‘मेरे करण-अर्जुन आएंगे’ का जप करते-करते एक दुखियारी मां को अगर उसके करण-अर्जुन फिल्म के आखिरी प्लॉट में उपलब्ध हो पाए, तो आपको इत्ती जल्दी अच्छे दिन कैसे दिखा दें?

इसीलिए मोदी साहब ने शुरुआत में ही पब्लिक को कड़वी दवा ऑफर की थी। दवा तो दवा होती है, विष तो नहीं कि प्रजा का गला नीला पड़ जाए। कड़वी दवा यह मानकर गटकने को कहा गया था, ताकि इसके बाद सब कुछ अच्छा-अच्छा महसूस होने लगे। वैसे भी हमारी सोसाइटी में मीठी गोली देने वाले को गोलीबाज जैसी सड़क छाप उपमाओं से धिक्कारने का चलन है। यह बात सरकार भी बहुत अच्छी तरह से जानती है। वह अपने ऊपर गोलीबाज होने का धब्बा नहीं लगने देना चाहती, इसीलिए कड़वी दवा ऑफर की गई थी। हे सज्जनो, दवा के कड़वे होने पर मत जाइए। उसका भावार्थ समझिए। कड़वी दवा पब्लिक को स्वस्थ और मजबूत बनाने के लिए दी गई थी, ताकि उसके अंदर कड़े फैसले सहने की सामर्थ्य आ जाए। सामर्थ्यवान पब्लिक को बार-बार यह नहीं कहना पड़ता कि अच्छे दिन कब आएंगे।
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