नरेंद्र मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की मुहिम को अपना सुर देकर वरिष्ठ भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने देश के राजनीतिक यथार्थ को समझने में भारी भूल की है। चतुर सुजान सिन्हा यह भूल गए कि पिछले दो-तीन दशकों में देश में गठबंधन की राजनीति ने जो पगडंडी पकड़ी है, उस पर कद्दावर नेताओं के लिए बड़े कदमों से डगर भरने की गुंजाइश ही नहीं बची है। उस पगडंडी पर तो सिर्फ बौने और छोटे कद वाले नेता ही चहलकदमी कर सकते हैं।
मोदी सरीखे कद्दावर नेता को सीना फुलाकर डगर भरने के लिए जितनी चौड़ी और बड़ी सियासी सड़क चाहिए, वह फिलहाल बनी ही नहीं है। वैसी सड़क बनाने की सुध न तो 'शाइनिंग इंडिया' के दौर में ली गई और न 'भारत निर्माण' के मौजूदा दौर में।
खुद नरेंद्र मोदी ने गुजरात में तो हाड़-तोड़ मेहनत करके अपने चलने लायक सड़क बना ली है, मगर पूरे देश में ऐसी सड़क दूर-दूर तक नजर नहीं आती है। और गुजरात में भी यह सड़क बनाने में मोदी के रोडरोलर को कैसे-कैसे रोड़े (शंकर सिंह वाघेला, केशुभाई पटेल, कांशीराम राणा आदि) तोड़ने पड़े, यह उनसे बेहतर शायद ही किसी को पता है। ऐसी ही कोशिश करने वाले उनके कुछ हमसफर (भुवन सिंह खंडूरी, प्रेम कुमार धूमल) अधबीच में ही थक गए, तो कुछ (शिवराज सिंह, रमन सिंह) नजर लगने के डर से अपनी सड़क का गुणगान करने में जान-बूझकर परहेज बरतते हैं।
दरअसल, अपने यहां 1989 में शुरू हुई गठबंधन की राजनीति के दौर में कद्दावर तो दूर, आदमकद नेताओं के लिए भी ज्यादा जगह नहीं बची है। गठबंधन की राजनीति की मजबूरियों का रोना पहले अटल बिहारी वाजपेयी भी रो चुके हैं और अब मनमोहन सिंह भी रोते दिखते हैं। इस राजनीति में आपकी राजनीतिक जमीन जितनी कमजोर होगी और आपकी रीढ़ की हड्डी जितनी ज्यादा लचीली होगी, आप उतने ही अधिक स्वीकार्य और सफल साबित होंगे।
इसके विपरीत आपकी राजनीतिक जमीन मजबूत हुई या फिर रीढ़ की हड्डी सीधी और थोड़ी-सी भी कड़क हुई, तो आपकी स्वीकार्यता कम हो जाएगी। चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी के अपवाद को छोड़ दें, तो आप पाएंगे कि हमारे चार प्रधानमंत्रियों (पीवी नरसिंह राव, एचडी देवेगौडा, इंद्रकुमार गुजराल और मनमोहन सिंह) की अपनी राजनीतिक जमीन या तो थी ही नहीं या फिर बहुत कमजोर थी।
वर्ष 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर पर सवार होकर कांग्रेस जब सत्ता में लौटी, उस समय पीवी नरसिंह राव सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की तैयारी कर रहे थे और लोकसभा का चुनाव तक नहीं लड़े थे। उस समय कांग्रेस में नरसिंह राव से बड़े जनाधार और कद वाले कई और नेता भी थे, लेकिन नरसिंह राव अपनी कमजोर जमीन और लचीलेपन के कारण ही स्वीकार्य हुए।
यह अलग बात है कि नरसिंह राव ने ही अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को अपना वित्त मंत्री बनाया और पिछली सदी के नब्बे के दशक में देश को आर्थिक उदारीकरण की राह पर आगे बढ़ाया। वर्ष 1996 में आम चुनाव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार के लोकसभा में विश्वास प्रस्ताव हार जाने के बाद तो गठबंधन की राजनीति का और भी विद्रूप स्वरूप सामने आया। तब ज्योति बसु और चंद्रबाबू नायडू संयुक्त मोर्चा की पहली और दूसरी पसंद थे, लेकिन प्रधानमंत्री पद का छींका एचडी देवेगौडा के नाम टूटा, जो अपने राज्य कर्नाटक तक में सहज स्वीकार्य नहीं थे।
हद तो तब हो गई, जब कांग्रेस ने देवेगौडा सरकार से समर्थन का हाथ खींच लिया और इंद्रकुमार गुजराल के प्रधानमंत्री बनने की बारी आई। गुजराल विलक्षण बुद्धिजीवी और सिद्धांतकार जरूर थे, पर राजनीतिक जमीन के नाम पर सिफर थे। वह लालू प्रसाद यादव की मेहरबानी से बिहार से राज्यसभा में पहुंचे थे।
वर्ष 1999 के चुनाव के बाद प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी कद्दावर नेता जरूर थे, लेकिन उनकी राह आसान करने में भाजपा के बाहर उनकी स्वीकार्यता की भी बड़ी भूमिका रही। वर्ष 2004 में कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद सोनिया गांधी ने जिस अंदाज में मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा की, वह ज्यादा पुरानी बात नहीं है। मनमोहन सिंह की राजनीतिक जमीन या कद के बारे में यहां कोई बात न करना ही भला होगा।
इस तरह हम पाते हैं कि गठबंधन की मौजूदा राजनीति को कद्दावर नेता सुहाते ही नहीं हैं और नरेंद्र मोदी की राह में उनका कद्दावर होना ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की पैरवी दरअसल वही लोग कर रहे हैं, जो यह जानते हैं कि प्रधानमंत्री पद का छींका उनके नाम किसी भी हालत में नहीं टूटने वाला है। यशवंत सिन्हा, राम जेठमलानी और मोदी राग अलापने वाले दूसरे भाजपा नेता मोदी अलाप को तेज करके कमजोर जमीन वाले मोदी-विरोधियों को लामबंद होने का मौका जरूर दे रहे हैं।
यह तो सही है कि मोदी की कड़क छवि और खौफ के चलते भाजपा का कोई भी नेता उनका सीधा और मुखर विरोध नहीं करेगा, लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के लिए उचित मंच और उचित समय का राग जरूर अलापेगा। इस उचित मंच और उचित समय की एक बानगी हम नितिन गडकरी के हाथ से भाजपा अध्यक्ष पद छिनते हुए हाल ही में देख चुके हैं। रही मोदी की बात, तो उनसे यह उम्मीद करना ज्यादती होगी कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के लिए वह अपनी छवि बदलेंगे। मोदी अगर ऐसा करते हैं, तो फिर उनमें और दूसरों में भला अंतर ही क्या रह जाएगा।