गुजरात में अपने मुख्यमंत्रीकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विकास पुरुष कहलाते थे। वर्ष 2011 में भाजपा में दोबारा वापसी से कुछ ही पहले उमा भारती ने उन्हें विनाश पुरुष की संज्ञा दी थी। दरअसल मोदी के प्रतिद्वंद्वियों ने उन्हें यह नाम दिया था, क्योंकि 2012 में वह प्रधानमंत्री पद के मजबूत दावेदार बन गए थे। अलबत्ता उनके समर्थक और विरोधी एक मामले में एकमत हैं-मोदी में वह क्षमता कूट-कूटकर भरी है, जो लोकतंत्र में अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए जरूरी है-और वह है, चुनाव जीतने की क्षमता।
नरेंद्र मोदी ने 2002 में गुजरात विधानसभा का चुनाव सिर्फ जीता ही नहीं, बल्कि भाजपा की शानदार जीत से सबको चकित कर दिया। 2007 के चुनाव में संघ के अलावा पार्टी के भीतर से भी उनके लिए चुनौतियां थीं। इसके बावजूद मोदी के नेतृत्व में भाजपा को जीत हासिल हुई, तो इसके पीछे सोनिया गांधी की 'मौत के सौदागर' वाली टिप्पणी भी कमोबेश जिम्मेदार थी। 2012 के विधानसभा चुनाव में वह सिर्फ गुजरात का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे, बल्कि इसके जरिये अपनी राष्ट्रीय आकांक्षा और छवि को जोरदार तरीके से सामने रख रहे थे। इसका सुबूत तब देखने को मिला, जब जीत के बाद अहमदाबाद में उन्होंने हिंदी में मतदाताओं का शुक्रिया अदा किया। यानी अब उनके लक्षित श्रोता सिर्फ गुजरात में नहीं, बल्कि पूरे देश में थे।
मानो गुजरात में लगातार तीन विधानसभा चुनावों में शानदार जीत ही काफी न हो, 2014 के लोकसभा चुनाव में शानदार जीत, उसके बाद महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड विधानसभा चुनावों में विजय ने मोदी की एक अजेय छवि निर्मित की। लेकिन 2015 में अचानक ही मोदी के चुनावी पराक्रम पर विराम लग गया। दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों में वह पराजित हुए। बेशक इन दोनों राज्यों में भाजपा की हार को नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में आई कमी से उस तरह नहीं जोड़ा जा सकता-राष्ट्रीय राजनीति में वह अब भी सबसे लोकप्रिय राजनेता हैं-इसके बावजूद इन दो पराजयों ने उनकी साख तो घटाई ही।
दरअसल गलत रणनीति के कारण मोदी की छवि को नुकसान पहुंचा। चुनाव अभियानों में प्रधानमंत्री अपनी पार्टी को दिशा देते हैं, इसमें कोई नई बात नहीं है-लेकिन खासकर बिहार में उन्होंने जिस तरह प्रचार किया था, वह सिर्फ गलत रणनीति का ही नहीं, राजनीतिक समझदारी की कमी का भी सुबूत था। विश्लेषकों और पर्यवेक्षकों को जब महागठबंधन के पक्ष में जनमत साफ झुका दिखाई दे रहा था, तब भाजपा इस सच्चाई को नहीं भांप पा रही थी, या इसे स्वीकारने को तैयार नहीं थी, तो इसका मतलब यही था कि प्रधानमंत्री के पास सही जानकारी नहीं पहुंच रही थी।
इस साल केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, पश्चिम बंगाल और असम में विधानसभा के चुनाव हैं। इनमें से केवल असम ही ऐसा अकेला राज्य है, जहां भाजपा बहुमत में आने या चुनावी नतीजे के बाद किसी से गठजोड़ कर सरकार बनाने की उम्मीद कर सकती है। शेष राज्यों में भाजपा अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा ले, तो यही काफी होगा। ऐसी स्थिति में भाजपा के लिए समझदारी यही होगी कि वह चुनाव अभियानों में नरेंद्र मोदी को सर्वाधिक महत्व तो दे ही, साथ ही दूसरे बड़े नेताओं को भी वक्ताओं के तौर पर रखे। इससे होगा यह कि अगर इन चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन आशानुरूप नहीं रहा, तो उसके सर्वोच्च नेता की छवि पर असर नहीं पड़ेगा। भाजपा के रणनीतिकारों को चाहिए कि चुनाव प्रचारकों की टीम स्वतंत्र रूप से काम करे, और नरेंद्र मोदी के लिए चुनावी अभियानों के अलावा दूसरे महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान देने की गुंजाइश रखे। चुनाव अभियानों में मोदी की रणनीतिक भूमिका नहीं होनी चाहिए, न ही चुनाव अभियान उनके इर्द-गिर्द घूमना चाहिए।
पश्चिम बंगाल की भाजपा इकाई ने ऐसा निर्णय ले भी लिया है। उसने घोषित किया है कि बिहार की तुलना में पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियां बहुत कम होंगी। जहां तक तमिलनाडु की बात है, तो जब जयललिता जेल में थीं, तब भाजपा के वहां एक संभावनाशील राजनीतिक पार्टी के रूप में उभरने की संभावना थी, पर अब उसके लिए वहां कोई उम्मीद नहीं है। इसके बावजूद वहां एक या दो रैलियों से मोदी की छवि पर कोई असर नहीं पड़ने वाला, बल्कि इससे उनकी राष्ट्रीय छवि ही मजबूत होगी। तुलनात्मक रूप से केरल में भाजपा के लिए स्थिति कुछ बेहतर है। इसके संकेत हैं कि दशकों से वहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सक्रियता का नतीजा अब दिखने लगा है। अब तक वहां भाजपा के लिए कोई प्रभावी चेहरा नहीं था, लेकिन मोदी की रैलियों में जुटती भीड़ से केरल में पार्टी का मतदान प्रतिशत बढ़ने के साथ-साथ एक या दो सीटों पर जीत की भी उम्मीद है।
अलबत्ता असम में भाजपा को गंभीरता से विचार करना होगा कि चुनाव में नरेंद्र मोदी का उसे कितना इस्तेमाल करना चाहिए। असम में भाजपा का प्रदर्शन ध्रुवीकरण पर निर्भर करेगा, और मोदी के मोर्चे पर होने का पार्टी को बेशक लाभ मिलेगा। लेकिन अगर असम में कांग्रेस, एयूडीएफ और अगप मिलकर महागठबंधन बना लें, तो मोदी की रैलियों को सीमित करना ही बेहतर होगा, भले इससे वहां पार्टी की संभावना खत्म हो जाए। प्रधानमंत्री काल में वर्ष 2016 नरेंद्र मोदी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि कमोबेश इस साल के प्रदर्शन से भी 2019 के लोकसभा चुनाव में उनकी दावेदारी निर्भर करेगी। लिहाजा उनकी पार्टी चुनावों में उनका कैसा इस्तेमाल करती है, यह बहुत महत्वपू्र्ण है। उनकी छवि का इस्तेमाल तो करना ही चाहिए, लेकिन उसे बचाए रखना भी जरूरी है।
वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक