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जीवंत है स्वतंत्रता की भावना : आजादी से पहले कांग्रेस में हर तरह के मत वाले लोग थे

सुब्रत मुखर्जी, पूर्व प्राध्यापक Published by: सुब्रत मुखर्जी Updated Thu, 15 Aug 2019 01:16 AM IST
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झंडा - फोटो : a

हाल ही में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर दिया, जो जम्मू-कश्मीर के विकास में बाधक बन रहा था। मौजूदा केंद्र सरकार ने साहसिक फैसला लेते हुए इस अस्थायी अनुच्छेद को निष्प्रभावी कर दिया। इस पृष्ठभूमि में आज के स्वतंत्रता दिवस का महत्व कुछ और बढ़ जाता है।

वर्ष 1947 में ब्रिटेन से स्वतंत्रता हासिल करने के बाद एक उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था का निर्माण हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है। भारत की इस शानदार सफलता के महत्वपूर्ण कारणों में दो अहम संगठनों की भूमिका थी। पहला, महात्मा गांधी द्वारा अत्यंत सजगता से बनी राजनीतिक पार्टी और दूसरा, कुशल और राजनीतिक रूप से तटस्थ भारतीय लोकसेवा। हालांकि शुरू में भारत में लोकतंत्र की संभावनाओं के बारे में संदेह जताए गए।



आजादी से पहले कांग्रेस में हर तरह के मत वाले लोग थे। नेहरू और पटेल का नजरिया अलग-अलग था। पर आजादी के बाद राजेंद्र प्रसाद, अबुल कलाम आजाद, नेहरू और पटेल-इन चारों ने साझा नेतृत्व प्रदान किया, जिसने संविधान सभा के सुचारू संचालन और संविधान निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई। पटेल ने नेहरू को प्रधानमंत्री बनने में मदद भी की, हालांकि कांग्रेस संगठन में उनका बहुमत था। उनका तर्क था कि देश में उनके मुकाबले नेहरू के अनुगामी ज्यादा हैं।

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हाल ही में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर दिया, जो जम्मू-कश्मीर के विकास में बाधक बन रहा था। मौजूदा केंद्र सरकार ने साहसिक फैसला लेते हुए इस अस्थायी अनुच्छेद को निष्प्रभावी कर दिया। इस पृष्ठभूमि में आज के स्वतंत्रता दिवस का महत्व कुछ और बढ़ जाता है।

वर्ष 1947 में ब्रिटेन से स्वतंत्रता हासिल करने के बाद एक उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था का निर्माण हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है। भारत की इस शानदार सफलता के महत्वपूर्ण कारणों में दो अहम संगठनों की भूमिका थी। पहला, महात्मा गांधी द्वारा अत्यंत सजगता से बनी राजनीतिक पार्टी और दूसरा, कुशल और राजनीतिक रूप से तटस्थ भारतीय लोकसेवा। हालांकि शुरू में भारत में लोकतंत्र की संभावनाओं के बारे में संदेह जताए गए।

आजादी से पहले कांग्रेस में हर तरह के मत वाले लोग थे। नेहरू और पटेल का नजरिया अलग-अलग था। पर आजादी के बाद राजेंद्र प्रसाद, अबुल कलाम आजाद, नेहरू और पटेल-इन चारों ने साझा नेतृत्व प्रदान किया, जिसने संविधान सभा के सुचारू संचालन और संविधान निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई। पटेल ने नेहरू को प्रधानमंत्री बनने में मदद भी की, हालांकि कांग्रेस संगठन में उनका बहुमत था। उनका तर्क था कि देश में उनके मुकाबले नेहरू के अनुगामी ज्यादा हैं।

एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में अपनी स्थापना के बाद से भारत जिस राह पर चला, वह उसकी नीतिगत पसंद थी, जिसे उसने नेहरू के नेतृत्व में अपनाया था। पटेल की अवहेलना कर नेहरू ने लेनिनवादी नीति का अनुसरण किया और समाज के समाजवादी पैटर्न ने, जिसे अर्थशास्त्री राजकृष्ण 'धर्मशाला पूंजीवाद' कहते थे, तीन फीसदी वार्षिक वृद्धि दर से देश का विकास किया, जिसे 'हिंदू विकास दर' कहा गया।

जैसा कि किसी व्यक्ति के जीवन में होता है, वैसा राष्ट्र के साथ भी होता है, पहले दस वर्ष ही स्थायी छाप छोड़ते हैं। यहां तक कि संविधान निर्माण के समय भी आंबेडकर के विपरीत नेहरू ने सांविधानिक लोकतंत्र, कानून के राज और शक्तियों के पृथक्करण के प्रति कभी कठोर प्रतिबद्धता नहीं दिखाई। उन्होंने घोषणा की कि 'अंततः संपूर्ण संविधान संसद की रचना है।' नेहरू की दोषपूर्ण लोकतंत्र की अवधारणा को श्रीमती इंदिरा

गांधी की कार्यशैली के दौरान मुखर अभिव्यक्ति मिली, जब उन्होंने अपनी सत्ता बचाने के लिए 1975 में देश पर आपातकाल थोप दिया था। यह सुप्रीम कोर्ट के आत्मसमर्पण का भी शर्मनाक दौर था। श्रीमती गांधी ने सत्ता के नशे में चूर होकर 17 साल तक सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में कोई संगठनात्मक चुनाव नहीं करवाया। कांग्रेस का पतन उनके समय में ही शुरू हो चुका था।

लेकिन स्वतंत्रता की भावना को विपक्षी नेताओं और कुछ कांग्रेसी नेताओं ने जिंदा रखा, जो श्रीमती गांधी के पिछलग्गू नहीं थे। यहां सुप्रीम कोर्ट के एक असंतुष्ट जज एच. आर खन्ना का जिक्र करना जरूरी है, जिन्होंने अपने असहमत फैसले से लोकतंत्र को जिंदा रखा।

वर्ष 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा और श्रीमती गांधी स्वयं भी चुनाव हार गईं। पर जनता पार्टी ज्यादा दिनों तक शासन नहीं चला सकी और श्रीमती गांधी फिर 1980 में सत्ता में लौटीं। वर्ष 1984 में उनकी हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने और 1984 के चुनाव में भारी बहुमत से जीते, लेकिन उनकी लोकप्रियता जल्द खत्म हो गई।

खुद राजीव गांधी की 1991 में हत्या हो गई। 1985 में कांग्रेस के शताब्दी समारोह में उन्होंने खुद बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और अक्षमता को स्वीकार किया था। राजीव ने शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी रद्द कर दिया, इससे भाजपा के प्रति हिंदू मतों का झुकाव बढ़ा।

संयुक्त मोर्चा सरकार के साथ संक्रमण का एक संक्षिप्त दौर रहा, फिर नरसिंह राव की अल्पमत सरकार सत्ता में आई। राव का कार्यकाल सबसे महत्वपूर्ण था, क्योंकि उन्होंने भारत को नेहरू और उनके अनुयायियों द्वारा आयातित प्रतिस्थापन मॉडल को छोड़ने के लिए मजबूर किया था और संरचनात्मक सुधारों, उदारीकरण और वैश्वीकरण को स्वीकार किया था।

मनमोहन सिंह ने बाजार की अर्थव्यवस्था के लिए कठिन परिवर्तन का मार्गदर्शन किया और बाद में 2004 और 2009 में प्रधानमंत्री बने। सी. राजगोपालाचारी जिन्होंने लाइसेंस परमिट कोटा राज वाली नेहरू की योजना का विरोध किया था, इतिहास में सही साबित हुए।

1990 के दशक में भाजपा का परिधि से भारतीय राजनीति के केंद्र में उभार चौंकाने वाला था, जो दर्शाता था कि कांग्रेस का एक स्पष्ट विकल्प आ गया है। हालांकि वाजपेयी का कार्यकाल भी कांग्रेसी संस्कृति के दायरे में था, जिसे कई लोग भाजपा का कांग्रेसीकरण और उदारीकरण कहते थे।

वर्ष 2004 और 2009 में एक कमजोर कांग्रेस ही सत्ता में लौटी, दूसरे कार्यकाल के अंत में उसकी थकान स्पष्ट दिख रही थी और 2014 के चुनाव में वह मात्र 44 सीटों पर सिमट गई, हालांकि 2019 में उसका प्रदर्शन थोड़ा बेहतर हुआ। उसका वोट प्रतिशत दोनों बार स्थिर रहा, जबकि भाजपा के वोट प्रतिशत में प्रभावशाली वृद्धि देखी गई। सिंहावलोकन करें, तो नेहरू की विरासत घरेलू और विदेश नीति, दोनों मामलों में बहुत विभाजनकारी रही।

भाजपा की 2014 और 2019 में लगातार जीत भारतीय राजनीति में बदलाव का संकेत है। भाजपा का उदय भारतीय राजनीति में कांग्रेस के एकदलीय वर्चस्व की समाप्ति का संकेत देता है। इसके अलावा भारतीय राजनीतिक परिदृश्य से वामपंथी पूरी तरह से हाशिये पर चले गए हैं।

हालांकि भारत लगातार बहुलता के साथ बहुदलीय लोकतंत्र बना हुआ है और कमजोर राजनीतिक दलों के भी लंबे समय तक बने रहने की संभावना है। लेकिन महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

मगर आर्थिक व्यवस्था पर राजनीतिक सहमति और जनसांख्यिकीय लाभ के साथ वर्तमान में भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। संविधान के साथ लोगों की मांगों और आकांक्षाओं के लिए राष्ट्र अनिवार्य रूप से अधिक संवेदनशील हो गया है।

एक जीवंत राष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रेस, बढ़ती साक्षरता और जागरूकता के कारण लोगों की लोकतंत्र में भागीदारी काफी बढ़ गई है। भारत की राष्ट्रीयता में गर्व के साथ व्यापक राष्ट्रीय एकजुटता बढ़ी है। इन फायदों के साथ भारत 2022 में ज्यादा आत्मविश्वास के साथ आजादी के 75 वर्षों का जश्न मना सकता है।
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