यह वह सप्ताह है, जिसमें ताजा होगी गए वर्ष की सारी राजनीतिक यादें। खासकर हम जैसे राजनीतिक पंडितों के लिए, जो 26 मई, 2014 को राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में उपस्थित थे, नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह के समय। मुझे याद है कि उस दिन गर्मी इतनी बेरहम थी कि वीवीआईपी अपने शानदार कपड़ों में पिघलते दिख रहे थे। हम उनके बिल्कुल पीछे वाले हिस्से में बैठे थे, और समारोह के बीच हंगामा मच गया था, जब वित्त मंत्री के पुत्र गर्मी के कारण बेहोश हो गए थे। उनके आसपास बैठे सब लोग उनकी मदद में लग गए थे राहुल गांधी के अलावा। राहुल और उनकी मां सोनिया गांधी ऐसे सूजे हुए चेहरे लेकर आए थे शपथ ग्रहण समारोह में, जैसे किसी दुश्मन देश के प्रधानमंत्री शपथ ले रहे हों।
मुझे ताज्जुब हुआ यह देखकर कि उनसे ज्यादा खुश नजर आए नवाज शरीफ, जो इस उम्मीद से पाकिस्तान से आए थे वहां की सेना की आपत्ति के बावजूद कि नई शुरुआत होगी, दोनों देशों के बीच नए सिरे से रिश्ते जोड़े जाएंगे। ऐसा हुआ नहीं, लेकिन क्या नई शुरुआत अन्य क्षेत्रों में हुई है? क्या निराशा का वह माहौल दूर हो गया है, जिसकी वजह से देश के मतदाताओं ने तीस वर्ष बाद किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत देकर भेजा? राहुल गांधी ने तो पिछले सप्ताह कह दिया कि वह मोदी सरकार को दस अंकों में शून्य देते हैं, क्योंकि उनकी सूट-बूट की सरकार ने किसानों के लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि अमेठी का पिछड़ापन भी मोदी की वजह से है। यह सुनकर याद आया कि राहुल गांधी की बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए।
सो, मेरी राय में मोदी सरकार के एक वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि जो देशवासी पिछले वर्ष निराशा के अंधेरे में डूबे हुए थे, अब निराश नहीं हैं। टीवी पत्रकार जब आम आदमी से मोदी सरकार के पहले वर्ष के बारे में पूछते हैं, तो जवाब आता है-कुछ नहीं बदला है। उनकी शिकायतें अधिकतर होती हैं सरकारी अधिकारियों या पुलिसवालों को लेकर। मुंबई के बेघर लोग बरसात के मौसम से पहले बंजर जमीनों पर अपनी छोटी कच्ची झुग्गियां डालने की कोशिश में लग जाते हैं। उनका कहना है कि जब से महाराष्ट्र में भाजपा सरकार बनी है, पुलिसवाले इन झुग्गियों को तोड़ने में सख्ती से पेश आ रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि बरसात के महीने उन्हें बिना छत के गुजारने होंगे। दुकानदारों और छोटे व्यापारियों की शिकायत यह है कि अपना कारोबार चलाने के लिए वे जिन सरकारी अफसरों को अब तक घूस देते आए हैं, वे अब भी उनसे रिश्वत ले रहे हैं।
निजी तौर पर प्रधानमंत्री से मेरी शिकायत यह है कि वह जनता से इतना दूर हो गए हैं कि शिकायतें उन तक पहुंच नहीं पातीं। कई पूर्व प्रधानमंत्री अपने निवास पर हर सुबह आम लोगों से मिला करते थे। सो विनम्रता से मेरी तरफ से सुझाव है मोदी जी को कि वह इसके बारे में सोचें। मैं अब भी प्रधानमंत्री के समर्थकों में से हूं, क्योंकि मैंने इस गए वर्ष में कई क्षेत्रों में परिवर्तन आते देखा है। एक दशक बाद देश को ऐसा प्रधानमंत्री मिला है, जिसका उत्तरदायित्व जनता को है, किसी व्यक्ति को नहीं। सो, अच्छे दिन बेशक न आए हों, पर अच्छे दिनों के आसार तो दिखने लगे हैं। हालांकि अच्छे दिन आएं, उनसे पहले खुद नरेंद्र मोदी को भी जनता को साथ लेकर चलना पड़ेगा।