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केसीआर के लिए कठिन है आगे का रास्ता

महेंद्र बाबू कुरुवा
Updated Thu, 14 Nov 2019 08:18 AM IST
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हुसेन सागर झील के किनार से होकर गुजरने वाली और जुड़वा शहर हैदराबाद और सिकंदराबाद को जोड़ने वाली ऐतिहासिक टैंक बंड सड़क तेलंगाना के लोगों के हित में होने वाली अनेक यादगार घटनाओं की गवाह है। एक बार तेलंगाना आंदोलन के दौरान इसके नेता चंद्रशेखर राव के समर्थन में यह नारों से गूंज उठी थी। राव के आह्वान पर तत्कालीन आंध्र प्रदेश के शासकों के खिलाफ प्रदर्शन करते उनके समर्थकों ने बेरीकेड्स तोड़कर लाठियां खाने से गुरेज नहीं किया था। यह विडंबना ही है कि अलग राज्य बनने के कुछ वर्षों के बाद ही केसीआर के लिए रैलियों में शामिल होने वाले लोगों को बीते शनिवार को उसी टैंक बंड क्षेत्र में बेरिकेड्स का सामना करना पड़ा है और तेलंगाना की बर्बर पुलिस की लाठियां खानी पड़ी है।



इस बार आवाज उठाने वाले तेलंगाना स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (टीएसआरटीसी) के कर्मचारी थे, जो कि पिछले चालीस दिनों से अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर हैं। वे तेलंगाना राज्य सरकार के अन्य कर्मचारियों की तरह वेतन की मांग कर रहे हैं। लेकिन मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने कड़ा रुख अपनाया हुआ है। उन्होंने उनकी मांगों को खारिज करते हुए 5100 बस मार्गों के निजीकरण की घोषणा कर दी और हड़ताली कर्मचारियों को 'स्व-बर्खास्त' घोषित कर दिया। सरकार की धमकियों के बावजूद टीएसआरटीसी के करीब पचाह हजार कर्मचारी अब भी हड़ताल पर हैं। यह मामला अब हाई कोर्ट में लंबित है। लेकिन हड़ताली कर्मचारियों को समाज के विभिन्न तबकों का जिस तरह का समर्थन मिल रहा है, उससे यह मौजूदा केसीआर सरकार के लिए राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है।


आखिर इन वर्षों में ऐसा क्या बदल गया? केसीआर और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर गौर करें, तो इस सवाल का जवाब मिल जाएगा। वर्ष 2000 और उसके बाद बने सारे छोटे राज्यों की तरह तेलंगाना की स्थापना मुख्यधारा और विकास से अलग-थलग महसूस करने वाले स्थानीय लोगों की मांगों को ध्यान में रखकर की गई थी। उन्हें लग रहा था कि अलग राज्य में उनके पास अधिक अवसर होंगे और पहले आर्थिक रूप से और फिर सामाजिक रूप से वे आगे बढ़ सकेंगे। हालांकि कोई भी नया राज्य राजनीतिक ढांचे, आर्थिक बाध्याताओं और जनसांख्यिकी मुद्दों के कारण अपने आबादी के सपनों को पूरी तरह से हकीकत में नहीं बदल सका है। हालांकि आर्थिक विकास और सामाजिक सूचकांकों के मामले में अन्य राज्यों से तेलंगाना ने बेहतर प्रदर्शन किया है।


अपने पहले कार्यकाल के दौरान केसीआर ने राज्य के कल्याण के लिए अनेक कदम उठाए। अपने काम पर भरोसा करते हुए उन्होंने समय से पहले विधानसभा भंग की और लोगों ने उन्हें दो तिहाई से अधिक बहुमत के साथ दोबारा सत्ता सौंपी। लेकिन समय के साथ काफी चीजें बदल गई हैं। पहले कार्यकाल के दौरान उनका भाजपा से अच्छा रिश्ता था। तीसरे फ्रंट के उनकी कवायद के साथ ही भाजपा से उनकी दूरी बढ़ती गई और इसका खामियाजा उन्हें लोकसभा चुनाव में उठाना पड़ा और उनकी पार्टी 17 में से सिर्फ नौ सीटें जीत सकी। कांग्रेस पहले ही राज्य में दरकिनार हो चुकी है। टीएसआरटीस की हड़ताल एक संवेदनशील मुद्दा है, जो उन तकरीबन एक करोड़ लोगों को प्रभावित कर रहा है, जो रोजाना सरकारी बसों से सफर करते हैं। इससे संवेदनशील तरीके और राजनीतिक परिपक्वता के साथ निपटने की जरूरत है। केसीआर के लिए दीवार पर लिखी इबारत बहुत साफ है। वह जितनी जल्दी इसे पढ़ लें उनके लिए अच्छा होगा। केसीआर जयललिता नहीं हैं और न ही भाजपा कांग्रेस है। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्हें निकट भविष्य में बड़े झटके लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि आगे की सड़क समतल नहीं है।

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